Thursday, December 24, 2020

काकोरी के शहीदों की 93वीं बरसी: उनकी समतामूलक-धर्मनिरपेक्ष और साझी शहादतों की विरासत को आत्मसात करके ही हम हिन्दुत्वादी हमलों को विफल कर सकते हैं

 

काकोरी के शहीदों की 93वीं बरसी 

उनकी समतामूलक-धर्मनिरपेक्ष और साझी शहादतों की विरासत को आत्मसात करके ही हम हिन्दुत्वादी हमलों को विफल कर सकते हैं

अगस्त 9, 1925 के दिन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से सम्बंधित इंक़लाबियों के एक समूह ने, जिस में चंदरशेखर आज़ाद, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान, राम प्रशाद बिस्मिल, राजेंदर लाहिरी, रोशन सिंह, मन्मथनाथ गुप्त, सचिन्द्र बख़्शी, केशब चक्रवर्ती, बनवारी लाल और मुकंदी लाल शामिल थे, एक सवारी रेलगाड़ी को काकोरी रेल-स्टेशन (लखनऊ से लगभग 40 किलोमीटर) के पास रोक कर अँगरेज़ सरकार के ख़ज़ाने को लूट लिया था।  अँगरेज़ शासकों और उनके हिंदुस्तानी दलालों ने इस वारदात को कुछ गर्म-दिमाग़ के आतंकवादी नौजवानों दुवारा एक डकैती की संज्ञा दी थी जिका उद्देश्य हथियारों और गोलाबारूद हासिल अराजकता फैलाना था। जबकि इंक़लाबियों के समकालिक वर्तान्त बताते हैं की इस सरकारी ख़ज़ाने को इस लिए लूटा गया था ताकि बड़े पैमाने पर समाजवादी साहित्य छपवाया जाए जिसे नौजवानों, मेहनतकशों और बुद्धजीवियों के बीच वितरित किया जाए ताकि उनकी राजनैतिक सोच विकसित हो और वे अँगरेज़ विरोधी संघर्ष में सक्रिय हों। यह इंक़िलाबी अपने अनुभवों से सीख कर आतंकवादी सोच से उबर कर परिपक्व क्रांतिकारी सोच को आत्मसात कर चुके थे जिसकी अब यह समझ थी कि बिना व्यापक जनता को जोड़े अँगरेज़ राज को उखाड़ फेंका नहीं जा सकता। इस का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1928 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दया गया था। बात बहुत साफ़ थी कि अब कोई वैचारिक भर्म नहीं था।  

अंग्रेज़ हुक्मरानों ने इन इंक़िलाबियों पर काकोरी षड्यंत्र नाम से मुक़्क़दमा चलाया और बहुत जल्दबाज़ी करते हुए अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान (जन्म: 22 October 1900) राम प्रशाद बिस्मिल (जन्म:11 June 1897), राजेंदर लाहिरी (जन्म: 23 June 1901) और ठाकुर रोशन सिंह (जन्म: 22 January 1892) को फांसी की सज़ा सुनायी गयी। 17 दिसंबर 1927 को राजेंदर लाहिरी को गोंडा जेल और 19 दिसंबर को राम प्रशाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल (उत्तर प्रदेश), अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान को फ़ैज़ाबाद जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल (सभी जेलें पूर्वी उत्तर प्रदेश में) में फांसी दी गयी।       

काकोरी के यह महान शहीद समग्रता में भारतीय नौजवानों का प्रतिनिधित्व करते थे; उम्र में सब से बड़े ठाकुर रोशन सिंह 35 वर्ष और सब से छोटे राजेंदर लाहिरी केवल 26 वर्ष के थे। काकोरी के यह शहीद हे इन्हीं बल्कि इंक़लाबी तहरीक में शामिल नौजवान देश के हर कोने से आते थे, मिसाल के तौर पर भगत सिंह और सुखदेव पंजाब, राजगुरु महाराष्ट्र, ज्योतिष चंद्र पाल ओडिशा के रहने वाले थे। यह सब एक साथ एक ही उद्देश्य से जान तक क़ुर्बान करने के लिए एक साथ आए  थे और वह था अंग्रेज़ी राज को उखाड़ फेंकना और एक समता-मूलक तथा धर्म-निरपेक्ष आज़ाद देश का निर्माण।    

समाजवादी आज़ाद देश: काकोरी के शहीदों का सपना

यह प्रतिबद्धता काकोरी के शहीदों में से एक अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान के लेखन में साफ़ तौर पर देखी जा सकती है। फांसी के फंदे को चूमने से कुछ घंटे पहले 'देशवासियों के नाम सन्देश' जिसे वे जेल से बाहर भेजने में सफल हुए में उन्हों ने बहुत स्पष्ट रूप से देश में एक समाजवादी व्वस्था स्थापित करने का आह्वान किया। देश के कम्युनिस्टों का ज़िक्र करते हुए उन्हों ने लिखा:   

"मैं तुम से काफ़ी तौर पर मुत्तफ़िक़ (सहमत) हूँ और कहूंगा कि मेरा दिल ग़रीब किसानों के लिए और दुखिया मज़दूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं ने अपने आयाम-ए-फ़रारी (पुलिस से छुपकर रहने वाला काल) में भी अक्सर इनके हालात देखकर रोया किया हूँ कियों की मुझे इन के साथ दिन गुज़रने का मौक़ा मिला है। मुझ से पूछो तो में कहूंगा कि मेरा बस हो तो में दुनिया की हर चीज़ इन के लिए वक़्फ़ (सुरक्षित) कर दूँ। हमारे शहरों की रौनक़ इन के दम से है। हमारे कारख़ाने इन की वजह से आबाद और कम कर रहे हैं। हमारे पम्पों से इन के हाथ ही पानी निकलते हैं, ग़रज़ की  दुनिया का  हर एक काम इन की वजह से हुआ करता है। ग़रीब किसान बरसात के मूसलाधार पानी और जेठ-बैसाख की तपती दोपहर में भी खेतों पर जमा होते हैं और जंगल में मंडराते हुवे हमारी खुराख का समान पैदा करते हैं।

"यह बिल्कुल सच है की वह जो पैदा करते हैं, जो वह बनाते हैं,  उनमें उनका हिस्सा नहीं होता, हमेशा दुखी और मुफ़लिस-उल-हाल (दरिद्र) रहते हैं। मैं इत्तेफ़ाक़ करता हूँ की इन तमाम बातों के ज़िम्मेदार हमारे गोरे आक़ा और उनके एजेंट हैं...मेरे दिल में तुम्हारी इज़्ज़त है और में मरते हुए भी तुम्हारे सियासी मक़सद से बिल्कुल मुत्तफ़िक़ हूँ। मैं  हिन्दोस्तां की ऐसी आज़ादी का खुवहिशमन्द था जिसमें ग़रीब खुश और आराम से रहते। ख़ुदा! मेरे बाद वह दिन जल्द आए जबकि छत्तर-मंज़िल लखनऊ में लोकोवर्कशॉप के अब्दुल्लाह मिस्त्री और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर ख़ालिक़-उज़-ज़मां और जगत नारायण मुल्ला व राजा साहेब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे नज़र आएं। 

"मेरे कॉमरेडों, मेरे रेवोलुशनरी भाईयों, तुम से में किया कहूं, तुमको किया लिखूं, बस यह तुम्हारे लिए किया कुछ कम मुसर्रत (ख़ुशी) की बात होगी, जब सुनोगे की तुम्हारा एक भाई हँसता हुआ फांसी पर चला गया और मरते-मरते खुश था। मैं  ख़ूब जानता हूँ की जो स्प्रिट (जज़्बा) तुम्हारा तबक़ा (कम्युनिस्ट ग्रूप)  रखता है--कियोंकी मुझको भी फ़ख़्र (गर्व) है और अब बहुत ज़ियादा फ़ख़्र है की एक सच्चा रेवोलूशनरी हो कर मर रहा हूँ।"

 

 

हिन्दू-मुस्लमान कट्टर धार्मिक संगठन अँगरेज़ हुक्मरानों के प्यादे : अशफ़ाक़ुल्लाह

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान अपने दुसरे इंक़लाबी साथियों की तरह इस सच से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक बटवारा अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई में सब से बड़ा बाधक था। यह सांप्रदायिक विभाजन विदेशी हुक्मरानों के ज़ालिम राज को बनाए रखने का सब से बड़ा कारण  था। उन्हों ने हिन्दू और मुस्लमान राष्ट्रवाद के ठेकेदारों को बेनक़ाब करते है लिखा:

 

"ओह! हम अपने वर्तमान समय का आनंद कैसे ले सकते हैं, जब हमारा राजनीतिक नेतृत्व आपसी झगड़ों में उलझा हो? एक अगर तब्लीग (इस्लाम का प्रचार) का दीवाना है तो दूसरे को मुक्ति केवल और केवल शुद्धि में दिखाई पड़ती है। उधर सरकारी गुप्तचर विभाग के कर्मचारी धर्म प्रचार के लिए धन उपलब्ध करा रहे हैं... उनका उद्देश्य धर्म का प्रचार-प्रसार या इसमें मदद करना कतई नहीं है, बल्कि वे तो [स्वतंत्रता संघर्ष की] चलती गाड़ी की राह में बाधा खड़ी करना चाहते हैं। मेरे पास वक्त नहीं है, न ही मुझे इसका मौका मिला कि मैं इस सांप्रदायिक साजिश को पूरी तरह उजागर कर पाता, जिसकी जानकारी मुझे फरारी काटने के दौरान व उसके बाद वाले दिनों में हुई... मैं अपने हिंदू व मुस्लिम भाइयों से कहना चाहता हूं कि यह ढोंग सीआईडी के गुप्त धन से रचे जा रहे हैं।"

देश के हिंदू व मुसलमानों के सामने अपना दिल खोल कर रख देने के बाद वह उन्हें सतर्क करते हैं:

"भाइयो! तुम्हारा आपस में इस तरह लड़ना, तुम्हारे आपसी मतभेद तुम में से किसी के भी काम न आएंगे। यह असंभव है कि सात करोड़ मुसलमान (शुद्धि के द्वारा) हिंदू धर्म अंगीकार कर लें, इसी तरह यह सोचना भी निरर्थक है कि (तब्लीग करके) 22 करोड़ हिंदुओं को मुसलमान बनाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में (अगर वे इसी तरह एक-दूसरे से लड़ते रहे तो) यह आसान होगा और बहुत आसान होगा कि वे सब अपने हाथों से अपने गले में तौक (कैदियों के गले में डाली जाने वाली लोहे की हंसली) डाल लें।"

"चाहे तुम कांग्रेसी हो या स्वराजवादी, तब्लीग पर चलने वाले हो या शुद्धि के समर्थक, कम्यूनिस्ट हो या क्रांतिकारी, अकाली हो या बंगाली, मेरा संदेश मेरे देश के हर व्यक्ति के लिए है। मैं धर्म व मान-मर्यादा के नाम पर हर किसी से मुखातिब हूं, चाहे वह अनिश्वरवादी हो या किसी भी ईश्वर को मानने वाला कि हम पर कृपा करो, जो काकोरी केस के लिए अपनी जान दे रहे हैं तथा भारत को 1920-21 (असहयोग आंदोलन) के दौर का भारत बना दो। एक बार फिर अहमदाबाद कांग्रेस (1921) वाली 'एकता और भाईचारा' दिखा दो, बल्कि उससे भी ज्यादा। जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी हमें संपूर्ण स्वतंत्रता का आह्वान कर के श्वेत स्वामियों (अंगरेजों) को यह बता देना चाहिए कि हम काले (भारतीय) अब किसी मंतर के जाल में नहीं फंसने वाले।

"तब्लीग और शुद्धि के पथ पर चलने वालो, खुदा के लिए अपनी आंखें खोलो और देखो कि तुम क्या थे और क्या हो गए। क्या किसी हिंदू या मुसलमान को आज वह धार्मिक स्वतंत्रता हासिल है, जो उसे पहले प्राप्त थी? क्या एक गुलाम देश का कोई धर्म होता है? (इस तरह की परिस्थितियों में) तुम कैसे अपने धर्मों का विकास कर सकते हो? आपसी एकता के साथ एकजुट हो कर रहो। वरना देश के पतन के तुम खुद जिम्मेदार होगे तथा देश को गुलामी की ओर धकेलने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही होगी।"

एक शेर में उन्होंने हिंदू व मुसलमान दोनों को मुखातिब करते हुए कहा कि वे अपने अनावश्यक मतभेद भुला दें:

यह झगड़े और बखेड़े मिटा कर आपस में मिल जाओ

अबस तफ़रीक़ है तुम में यह हिंदू और मुसलमां की275

अबस - अकारण, व्यर्थ / तफ़रीक़ - भेदभाव

शहीद राम प्रशाद बिस्मिल का बेलाग सन्देश

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान के सब से क़रीबी इंक़लाबी और साथ में शहीद होने वाले राम प्रशाद बिस्मिल ने भी शहादत प्राप्त करने स पहले बिलकुल इसी तरह के विचार व्यक्त किए।  उन्हों ने शहादत से केवल 3 दिन पहले देश के आम लोगों के लिए 'अंतिम समय की बातें' शीर्षक के अंतर्गत  जो सन्देश छोड़ा वह हमेशा याद रखा जाएगा:

"आज 16 दिसम्बर 1927 ई० को निम्नलिखित पंक्‍तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जबकि 19 दिसम्बर 1927 ई० सोमवार (पौष कृष्‍णा 11 सम्वत् 1984 वि०) को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्‍चित हो चुकी है।

"क्योंकि मेरा जन्म-जन्मान्तर उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्रकृति पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्‍त हो । कोई किसी पर हकूमत न करे । सारे संसार में जनतन्त्र की स्थापना हो । वर्तमान समय में भारतवर्ष की अवस्था बड़ी शोचनीय है । अतःएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब तक कि भारतवर्ष के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण स्वतन्त्र न हो जाएं ।

"मैं प्राण त्यागते समय निराश नहीं हूं कि हम लोगों के बलिदान व्यर्थ गए । मेरा तो विश्‍वास है कि हम लोगों की छिपी हुई आहों का ही यह नतीजा हुआ कि लार्ड बर्कनहेड के दिमाग में परमात्मा ने एक विचार उपस्थित किया कि हिन्दुस्तान के हिन्दू मुसलिम झगड़ों का लाभ उठाओ और भारतवर्ष की जंजीरें और कस दो । गए थे रोजा छुड़ाने, नमाज गले पड़ गई ! भारतवर्ष के प्रत्येक विख्यात राजनैतिक दल ने और हिन्दुओं के तो लगभग सभी तथा मुसलमानों के अधिकतर नेताओं ने एक स्वर होकर रायल कमीशन की नियुक्‍ति तथा उसके सदस्यों के विरुद्ध घोर विरोध व्यक्त किया है, और अगली कांग्रेस (मद्रास) पर सब राजनैतिक दल के नेता तथा हिन्दू मुसलमान एक होने जा रहे हैं ।

"वाइसराय ने जब हम काकोरी के मत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैंने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अगली कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनानी चाहिए । सरकार ने अशफ़ाक़ुल्लाह को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया । अशफ़ाक़ुल्लाह कट्टर मुसलमान होकर पक्के आर्यसमाजी रामप्रसाद का क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बनते, तब क्या नये भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते? मरते 'बिस्मिल' 'रोशन' 'लहरी' 'अशफाक' अत्याचार से/होंगे पैदा सैंकड़ों इनके रुधिर की धार से ॥"

इस से ज़्यादा दुखद किया बात हो सकती है की हमारे देश के हुक्मरानों, मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों और मीडिया ने एक संयोजित ढंग से इस महान जनपक्षीय विरासत को छुपाए रखने की दिन-रात कोशिश की है जिस में वे सफल भी हुए हैं। आज भारत की प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष राज्यव्यवस्था किस तरह हिन्दुत्वादी ख़ूनी पंजे के शिकंजे में है उस की बड़ी वजह काकोरी के शहीदों की क़ुर्बानियों और जिन उद्देश्यों के लिए उन्हों ने क़ुर्बानियां दी थीं को भुला दिया जाना है। अब भी वक़्त है की हम सब मिलकर इन शहीदों की समतामूलक-धर्मनिरपेक्ष और साझी शहादतों की विरासत को आत्मसात करें ताकि राष्ट्र और समाज विरोधी हिन्दुत्वादी मंसूबों को शिकस्त दी जा सके।

शम्सुल इस्लाम

19-12-2020

शम्सुल इस्लाम के अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, मराठी, मलयालम, कन्नड़, बंगाली, पंजाबी, गुजराती में लेखन और कुछ वीडियो साक्षात्कार/बहस के लिए देखें :

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