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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
एक आतंकी संगठन
संघ के अपने दस्तावेज़ों से सबूत
— शम्सुल इस्लाम
Hindi translation of
Rashtriya Swayamsevak Sangh
as a Terror Outfit: Evidence from its archives
by Shamsul Islam

र्इ-पुस्तक का प्रथम संस्करण, नवंबर 2020
[कुछ हिस्सों का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद श्री कमल सिंह द्वारा]
यह र्इ-पुस्तक कॉपी-राइट से मुक्त है। आरएसएस के दस्तावेज़ों के प्रस्तुतिकरण का मक़सद आरएसएस के असली चरित्र के प्रति सचेत करना है। यह हिंदुत्ववादी संगठन न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में लोकतंत्र, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, समता-मूलक और सह-अस्तित्व पर आधारित समाज के निर्माण के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन कर उभरा है। यहां जिन दस्तावेज़ों को प्रस्तुत किया गया है वे आरएसएस के ही संग्रहालय और अधिकारिक सूत्रों पर आधारित हैं। बिना किसी वित्तीय लाभ, तथ्यों तथा लेखकीय परिवर्तन किए इनका उपयोग किया जा सकता है, जिसमें अन्य भाषाओँ में अनुवाद भी शामिल है। लेखक इस संबंध में सुझाओं का स्वागत करेगा।
शम्सुल इस्लाम दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीती शास्त्र के अध्यापक (1973-2013) रहे हैं और जन-नाट्य कर्मी हैं। उन्हों ने एक लेखक, पत्रकार, स्तंभकार और नुक्कड़-नाटक कर्मी के तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में धार्मिक कट्टरता, जातिवाद, तानाशाही, अमानवीकरण, साम्राज्यवादी मंसूबों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और दलितों के दमन के ख़िलाफ़ हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में लगातार लिखा है और नाटक खेले हैं। वे राष्ट्रवाद के उदय और उसके धार्मिक रूपांतरों में विकास पर मौलिक शोध के लिए विश्व-भर में जाने जाते हैं। भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857) पर उनका, समकालीन मौलिक स्रोत्रों पर आधारित, लेखन इस संग्राम से सम्बंधित उन सच्चाईयों को उजागर करता है जिनपर कभी चर्चा नहीं होई है। उनका लेखन देश की लगभग हर भाषा में उपलब्ध है।
शम्सुल इस्लाम के अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, मराठी, मलयालम, कन्नड़, बंगाली, पंजाबी, गुजराती में लेखन और वीडियो साक्षात्कार/बहस के लिए देखें : http://du-in.academia.edu/ShamsulIslam
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विषय-क्रम
1. नाज़ी और फ़ासीवादी दलों के नमूने पर आरएसएस का गठन।
2. फ़ासीवाद के जनक बेनिटो मुसोलिनी के साथ संपर्क
4. म्यांमार (बर्मा) सैन्य शासकों के साथ आरएसएस का याराना।
5. यूरोप में फ़ासिस्टों के पुनरोत्थान से आरएसएस में जश्न
6. नस्लवादी आरएसएस नाज़ी जर्मनी की तरह चला रहा है श्रेष्ठ आर्य बच्चे पैदा करने की परियोजना।
7. लोकतांत्रिक भारत के प्रति आरएसएस की नफ़रत।
8. विश्व में आरएसएस इकलौता सांस्कृतिक-धार्मिक संगठन जो हथियारों की पूजा करता है।
9. कांग्रेसी नेताओं की हत्या का आह्वान, मुसलमानों और र्इसार्इ डकैत घोषित।
10. गोलवलकर ने भारतीय स्वतंत्रता के समय मुसलमानों के ख़ात्मे के लिए योजना बनार्इ थी।
11. एक वरिष्ठ आरएसएस सदस्य द्वारा एक मुस्लमान लड़की की निर्मम हत्या के लिए एक जघन्य औचित्य।
12. देश विभाजन के दौरान मुसलमानों के संहार के लिए सरदार वल्लभार्इ पटेल ने भी आरएसएस को लताड़ा था।
13. मोदी राज में आरएसएस के आतंक के विरोध में उच्च पदस्थ भारतीय पुलिस अधिकारी का दर्द।
14. आंतिरक ख़तरा नंबर- एक हैं भारतीय मुसलमान और नंबर- दो र्इसार्इ।
15. गौ-वध पर गोलवलकर का झूठ जिसने उन्मादित भीड़ द्वारा मुसलमानों की हत्या का रास्ता प्रशस्त किया।
16. क्या ताजमहल का भी वही हश्र होगा जो अयोध्या में मस्ज़िद का हुआ था?
17. आरएसएस के अनुसार सिख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म स्वतंत्र धर्म नहीं हैं!
18. 1984 के सिख जनसंहार को आरएसएस के प्रमुख चिंतक/नेता नाना देशमुख ने जायज़ बताया।
19. नाना देशमुख को मोदी सरकार ने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान “भारत रत्न” से नवाज़ा।
20. अंतर्राष्ट्रीय फ़ासीवादी संगठनों के साथ आरएसएस के संपर्क।
21. आरएसएस ने राष्ट्रपिता गांधी तक को नहीं बख़्शा।
22. गांधीजी की हत्या पर उत्सव : बताया हिंदू-राष्ट्र की बलिवेदी पर दानव वध।
23. गोड्से की पिस्तौल की नीलामी चाहता है भाजपा आर्इटी-प्रकोष्ठ।
24. आरएसएस उत्तर भारत के सवर्ण हिंदूओं का वर्चस्ववादी संगठन।
25. आरएसएस के लिए हिंदू धर्म, हिंदू राष्ट्र और जातिवाद पर्यायवाची हैं।
25. शूद्रों/दलितों को कलंकित करने वाले मनु के आदेशों के कुछ नमूने।
26. हिन्दू महिलाओं को कलंकित करने वाले मनु के आदेशों के कुछ नमूने।
27. ‘काली चमड़ी’ वाले दक्षिण भारतीयों के प्रति आरएसएस की नफ़रत।
29. आरएसएस द्वारा आतंकवादी गतिविधियों में षड्यन्त्रों का इस्तेमाल।
30. श्रेष्ठ हिन्दू नस्ल विश्व पर राज करेगी।
1. नाज़ी और फ़ासीवादी दलों के नमूने पर आरएसएस का गठन।
लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत की राजनीतिक व्यवस्था पर हिंदुत्व राजनीति[1] थोपने का सिलसिला 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ख़ासतौर से बढ़ा है। आरएसएस के प्रचारक नरेंद्र मोदी पूरी तरह से हिंदुत्ववादी हैं। हिंदुत्व के प्रति उनकी प्रतिबद्घता निसंदिग्ध है। भारतीय लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष राजव्यवस्था से उनको घोर नफ़रत है। 2013 में जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने ख़ुद को हिंदू राष्ट्रवादी[2] घोषित किया था। आज़ाद भारत में यह पहला वाकया था, जब संवैधानिक पद पर आसीन किसी शख्स ने ख़ुद के हिंदू राष्ट्रवादी होने का एलान किया। ग़ौर तलब है भारत के राष्ट्रपिता माने जाने वाले मोहन दास करमचंद गांधी की 30 जनवरी, 1948 को दिल्ली में जिन आतंकवादियों ने हत्या की थी, वे भी ख़ुद को हिंदू राष्ट्रवादी बताते थे।
मोदी के प्रधानमंत्री पद पर काबिज़ होते ही, आरएसएस और उससे जुड़े अनेक ज्ञात और अज्ञात संगठनों ने हर्षोल्लास के साथ भारत में लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष राजव्यवस्था के विरोध में खुली जंग का एलान किया था। इस समय सड़क-चौराहों पर जिस तरह प्रचंण्ड हिंदुत्ववादी उन्माद का प्रदर्शन किया गया था, ऐसा नज़ारा आज़ादी के बाद पहले नहीं देखा गया था। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जैसे ही मोदी आसीन हुए, आएसएस के नेताओं ने घोषित किया कि पृथ्वीराज चौहान (1178-92) के 1000 साल बाद, भारत में अब फिर हिंदू शासन क़ायम हुआ है। आरएसएस के एक प्रमुख पदाधिकारी राजेश्वर सिंह ने कहा :
हमारा लक्ष्य भारत को 2021 तक हिंदू राष्ट्र बनाना है। मुसलमानों और र्इसाइयों को यहां रहने का कोर्इ अधिकार नहीं है...उन्हें या तो हिंदू धर्म अपनाना होगा अथवा यहां से निकल भागना होगा।[3]
आरएसएस की रगों में आतंकवाद दौड़ता है। यह तथ्य आरएसएस के ख़ुद के अभिलेखागार में मौजूद दस्तावज़ो से साबित हो जाता है। आरएसएस का गठन 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार (आरएसएस बिरादरी में डॉक्टरजी नाम से मशहूर),बालकृष्ण शिवराम मून्जे, उनके गुरु तथा हिंदुत्व के विचारक विनायक दामोदर सावरकर द्वारा किया गया था; ये सभी ब्राह्मण थे। हेडगेवार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में थे, लेकिन उन्होंने इस वजह से कांग्रेस छोड़ी क्योंकि वे एमके गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश-विरोधी स्वतंत्रता संग्राम के ख़िलाफ़ थे क्योंकि गांधीजी सभी धर्मों के लोगों को भारतीय राष्ट्र का अंग मानते थे। वे समावेशी स्वतंत्र भारत के पक्षधर थे। आरएसएस द्वारा प्रकाशित हेडगेवार की जीवनी में बताया गया है कि हेडगेवार कांग्रेस से इसी विशिष्ट कारण से नाराज़ थे कि वह हिन्दुओं और मुसलमानों की एकता की बात करती थी–
यह साफ़ है गांधीजी हिन्दू-मुस्लिम एकता को हमेशा केन्द्र में रख कर ही काम करते थे...लेकिन डाक्टरजी को इस बात में ख़तरा दिखाई दिया। दरअसल, वे ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ के नये नारे को पसन्द तक नहीं करते थे।[4]
2. फ़ासीवाद के जनक बेनिटो मुसोलिनी के साथ संपर्क
हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं के इस समूह ने घोषित किया कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और यहां मुख्य दुश्मन अंग्रेज़ नहीं बल्कि भारत के मुसलमान और ईसाई हैं। मुसलमान और ईसाई भारतीय राष्ट्रीयता से बाहर हैं, क्योंकि वे हिंदू सांस्कृतिक विरासत में शामिल नहीं हुए या उन्होंने हिंदू धर्म को नहीं अपनाया। सावरकर का तर्क था कि –
ईसाई और मुसलमान समुदाय, जो ज़्यादा संख्या में अभी हाल तक हिंदू थे और जो अभी अपनी पहली ही पीढ़ी में नए धर्म के अनुयायी बने हैं, भले ही हमसे साझा पितृभूमि का दावा करें और लगभग शुद्ध हिंदू ख़ून और मूल का दावा करें लेकिन उन्हें हिंदू के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती, क्योंकि नए पंथ को अपना कर उन्होंने कुल मिलाकर हिंदू संस्कृति का होने का दावा खो दिया है। वे हिंदू सांस्कृतिक इकाई से एकदम भिन्न इकाई के हैं या होने की अनुभूति रखते हैं। उनके नायक, उनके मेले, त्यौहार, आदर्श, जीवनदृष्टि हमारी जैसी नहीं रह गई है।[5]
हिंदू राष्ट्रवादियों के अनुसार, भारतीय मुसलमान और र्इसार्इ विदेशी धर्मों को अपना धर्म मानते हैं। इस तरह से वे “प्रवासी” हैं। उन्हें भारतीय राष्ट्र, जो कि सिर्फ़ एक हिंदू राष्ट्र है, का अंग नहीं माना जा सकता था। मुस्लिम और ईसाई “समस्या” के समाधान के लिए नाज़ी और फ़ासीवादियों ने यहूदियों को ख़त्म करने के लिए जो तरीक़ा अपनाया था, वह उन्हें काफ़ी आकर्षक लगा। इतालवी शोधकर्ता, मार्ज़िया कासोलारी (Marzia Casolari) ने मूंजे की डायरी के आधार पर आरएसएस और मुसोलिनी के बीच सीधे तालमेल और रिश्ते को जगज़ाहिर करके बड़ा महत्वपूर्ण काम किया है। मुंजे की डायरी का ज़िक्र करते उन्होंने बताया कि मूंजे,“एक राजनेता हैं, जो पूरी तरह से आरएसएस से संबंधित हैं।” मूंजे 19 मार्च, 1931 कीशाम रोम में मुसोलिनी से व्यक्तिगत रूप से मिले। दोनों के बीच निजी बातचीत में मूंजे ने मुसोलिनी से यह कहा:
मैंने आज सुबह ही और दोपहर में बलिल्ला [फ़ासीवाद विरोधियों के सफ़ाए के लिए संगठित सैनिक दस्ते] और फ़ा सिस्ट संगठनों को देखा और मैं काफ़ी प्रभावित हुआ। इटली को अपने विकास और समृद्धि के लिए उनकी ज़ रूरत है। मैं उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं देखता हूं...
‘सिग्नोर मुसालिनीः उनके बारे में आपकी क्या राय है?’
‘डा. मूंजेः महामहिम, मैं काफ़ी प्रभावित हुआ हूं। हर महत्वाकांक्षी और विकासमान राष्ट्र को ऐसे संगठनों की ज़रूरत होती है...
सिग्नोर मुसोलिनी-जो काफ़ी प्रसन्न मालूम पड़े, कहा-‘धन्यवाद, पर आपका काफ़ी कठिन कार्य है। पर मैं इसमें हर सफलता की कामना करता हूं।’
मुंजे की डायरी के अनुसार रोम से लौटने के तुरंत बाद मुंजे ने हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं को बताया :
नेताओं को जर्मनी के युवा आंदोलन तथा इटली के बलिल्ला एवं फ़ा सिस्ट संगठनों का अनुकरण करना चाहिए। मैं समझता हूं कि वे पूरी तरह भारत में लागू करने के अनुकूल हैं और विषेश परिस्थितियों के अनुरूप उन्हें अनुकूल बनाया जा सकता है। मैं इन आंदोलनों से काफ़ी प्रभावित हुआ हूं और मैंने स्वयं अपनी आंखों से विस्तार से उनके कार्यकलापों को देखा है।
31 मार्च, 1934, मूंजे, हेडगेवार और लालू गोखले की एक बैठक हुर्इ। इसमें इटली और जर्मनी की तर्ज़ पर भारत में हिंदुओं का सैन्य संगठन बनाने पर विचार किया गया। मूंजे ने इस बैठक में आह्वान किया कि वे इस दिशा में सक्रिय हों
मैंने हिन्दूधर्मषास्त्र पर आधारित एक योजना पर विचार किया है जो भारत भर में हिंदू धर्म के मानकीकरण की व्यवस्था करती है। पर मुद्दा यह है कि यह आदर्श तब तक प्रभावी नहीं हो सकता है जब तक कि हमारा अपना स्वराज नहीं हो जिसमें एक हिंदू पुराने षिवाजी की तरह या आज के इटली या जर्मनी के मुसोलिनी एवं हिटलर की तरह एक तानाषाह हो। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हमें हाथ जोड़कर बैठ जाना चाहिए जब तक कि भारत में कुछ ऐसा तानाषाह पैदा नहीं हो जाये। हमें एक वैज्ञानिक योजना निरूपित करनी चाहिए और उसके लिए प्रचार कार्य चलाना चाहिए।
मार्जिया के अनुसार, मुंजे ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि हिंदू समाज के सैन्यीकरण को आधार बनाकर हिंदू समाज को पुनर्गठित करने का उनका विचार “इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और इटली के सैन्य प्रशिक्षण विद्यालयों” से प्रेरित था, मुंजे द्वारा ‘सेंट्रल हिंदू मिलिट्री सोसाइटी की योजना और इसके लिए सैन्य स्कूल की स्थापना के लिए प्रस्तावना’के प्रारंभ में उल्लेख किया गया कि :
इस प्रशिक्षण का उद्देश्य दुश्मन को हर संभव नुकसान पहुंचाते हुए एवं सर्वाधिक हताहत करते हुए जीत हासिल करने की महत्वाकांक्षा के साथ लोगों की हत्या करने के लिए अपने लड़कों को सर्वथा सक्षम एवं उपयुक्त बनाना है।[6]
प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार, प्रोफ़ेसर रामचंद्र गुहा ने वर्तमान आरएसएस-भाजपा शासन द्वारा फ़ासी वादी इतालवी विरासत की निरंतरता को रेखांकित करते हुए लिखा है,
1920 के दशक का इटालियन राज्य और आज के मोदी शासन में कुछ ज़बरदस्त समानताएं हैं। ज़ुबानी तौर पर संविधान के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए व्यवहार में संविधान की भावना और उसके मूल अभिप्राय का घोर उल्लंघन, प्राचीन ज्ञान का वास्ता देते हुए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की अवहेलना, प्राचीन संस्कृति का गुणगान व्यवहार में घोर संकीर्णता।
“बेनिटो मुसोलिनी और वहां के फ़ा सिस्टों ने सोचा था कि वे इटली पर सदा-सर्वदा शासन करते रहेंगे। नरेंद्र मोदी और भाजपा भी इसी तरह सोचते हैं। शाश्वत शासन की कपोत-कल्पनाएं हकीकत में नहीं बदलती। बहरहाल, वर्तमान सत्ता जब तक बनी रहेगी, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक रूप से इसकी भयानक कीमत अदा करनी होगी। मुसोलिनी और उनकी पार्टी ने देश को जिस गर्त में डुबाया था उससे उबरने में इटली को कई दशक लग गए; मोदी और उनकी पार्टी जिस कदर बरबाद कर रही है, उससे उबरने में भारत को और भी अधिक समय लग सकता है।[7]
3. हिटलर द्वारा यहूदियों के जनसंहार की आरएसएस द्वारा सराहना, भारत में मुसलमानों और र्इसाइयों का जनसंहार का मंसूबा
आरएसएस के सबसे प्रमुख सिद्घांतकार माध्वराव सदाशिवराव गोलवलकर (संघ बिरादरी में गुरूजी) 1940 में आएसएस के प्रमुख (सरसंघचालक) बने थे। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री उन्हें श्रेय देते हैं कि गुरूजी ने ही उन्हें राजनीति में प्रशिक्षित किया है। गोलवलकर ने घोषित किया है :
अगर निर्विवाद रूप से हिन्दुस्थान हिन्दुओं की धरती थी और अगर केवल हिन्दुओं का ही फलना-फूलना निश्चित था तो इन सभी लोगों की नियति क्या होनी थी जो यहां रह रहे थे परंतु हिन्दू धर्म, जाति और संस्कृति से संबद्ध नहीं थे?[8]
उनका वही हश्र होगा, जो हिटलर और मुसोलिनी के राज्य में यहूदियों का हुआ था। गोलवलकर ने 1839 में लिखते हुए नाज़ियों द्वारा यहूदियों के विभत्स क़त्ले-आम को इन शब्दों में महिमामंडित किया:
जर्मन नस्लका गर्व आज चर्चा का विषय बन गया है। नस्ल तथा उसकी संस्कृति की शुद्धता बनाये रखने के लिये, देश को सामी नस्लों-यहूदियों- का खत्मा करके जर्मनी ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। यहां नस्ल का गौरव अपने सर्वोच्च रूप में अभिव्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी दिखा दिया है कि किस तरह ऐसी नस्लों तथा संस्कृतियों का, जिनकी भिन्नताएं उनकी जड़ों तक जाती हैं, एक एकीकृत समग्रता में घुलना-मिलना, लगभग असंभव ही है। यह हिंदुस्थान में हमारे लिए एक अच्छा सबक है कि सीखें और लाभान्वित हों।[9]
हिटलर का अनुसरण करते हुए भारत में अल्पसंख्यक “समस्या” के समाधान के लिए गोलवलकर अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मुसलमान और ईसाई विदेशी नस्ल से संबंधित हैं इसलिए,
चतुर प्राचीन राष्ट्रों के अनुभव से अनुमोदित इस दृष्टिकोण से हिंदुस्थान की विदेशी नस्लों को या तो निश्चित तौर पर हिन्दू संस्कृति और भाषा अपना लेनी चाहिये, हिन्दू धर्म का सम्मान तथा उस पर श्रद्धा रखना सीखना चाहिये, हिन्दू नस्ल और संस्कृति यानि हिन्दू राष्ट्र के गौरवगान के अलावा किसी और विचार को मन में नहीं लाना चाहिये और हिन्दू नस्ल में समाहित हो जाने के लिये अपनी पृथक पहचान त्याग देनी चाहिये या फिर वे इसे देश में पूरी तरह से हिन्दू राष्ट्र के अधीन बिना किसी दावे के, बिना किसी भी विशेषाधिकार के और उससे भी आगे बिना किसी भी वरीयतापूर्ण व्यवहार के, यहां तक कि बिना किसी नागरिक अधिकारके रह सकते हैं’ उनके लिये कोई और रास्ता अपनाने की छूट तो कम से कम नहीं ही होनी चाहिये। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं, हमें उन विदेशी नस्लों से, जिन्होंने रहने के लिये हमारे देश को चुना है, ऐसे ही निपटना चाहिये जैसे प्राचीन राष्ट्र निपटते हैं।[10]
हिटलर के यहूदी विरोधी जनसंहार का समर्थन करते हुए सारवरकर ने 14 अक्टूबर, 1938 को यहां तक कह दिया भारत में मुस्लिम समस्या का यही समाधान है :
एक राष्ट्र का निर्माण वहां रहने वाले बहुसंख्यक से होता है। यहूदियों ने जर्मनी में क्या किया? अल्पसंख्यक होने के कारण उन्हें जर्मनी से खदेड़ दिया गया।[11]
यह देखकर आज किसी को भी अश्चर्य हो सकता है कि आरएसएस ने हिटलर द्वारा किए गए जनसंहार (1940 और 1950 के दशक के प्रारंभ) का जिस तरह से खुलकर समर्थन किया था, आज वही लोग यहूदी राज्य का जोरशोर से समर्थन कर रहे हैं। आरएसएस के वर्तमान सर्वेसर्वा मोहन भागवत ने 3 नवंबर, 2014 को आगरा में ‘युवा संकल्प शिविर’ को संबोधित करते हुए, “राष्ट्रवाद की सेवा के लिए इज़ रायल के मार्ग पर चलने”[12] की पैरवी की। इज़ रायली प्रमुख दैनिक ‘येरुशलम पोस्ट’ में लिखते हुए देवसेना मिश्रा ने इन शब्दों में आरएसएस और इज़राइल के बीच इस लगाव को रेखांकित किया है :
जब भी भाजपा (आरएसएस का जेबी राजनीतिक संगठन) सरकार सत्ता में आती है, भारत-इज़रायल संबंध नई ऊंचाइयों पर पहुंच जाते हैं।[13]
इस तरह का दोग़लापन आरएसएस के लिए एक सामान्य बात है। ये इस संगठन के दो चेहरे हैं। ये कोर्इ विरोधाभास नहीं बल्कि दो चेहरे इसके फ़ासी वादी चरित्र की विशिष्टता को ही ज़ा हिर करते हैं। यहूदियों के जनसंहार का समर्थन आरएसएस ने इसलिए किया कियोंकि आर्य जाति के प्रति उसको ख़ास लगाव रहा है। आज आरएसएस यहूदी राज्य इज़ रायल का गुणगान कर रहा है। उसकी वजह अनार्य मुसलमानों से उसकी बेपनाह नफ़रत है। मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के अनुसार, हिंदुत्व के नुमाइन्देसावरकर और गोलवलकर ने आरएसएस के लिए यही रास्ता निर्धारित किया था, दोनों आर्य जाति की श्रेष्ठता में विश्वास और एडोल्फ़ हिटलर द्वारा लाखों यहूदियों को गैस चैंबरों में दम घोंट कर मारे जाने का समर्थन करते थे। इतना ही नहीं, ज़ायोनीवाद और इज़रायल के यहूदी राज्य का समर्थन आरएसएस द्वारा केवल इस ख़ातिर किया गया, क्योंकि वह अपने अरब मुस्लिम पड़ोसियों के ख़िलाफ़ युद्धरत है। इस्लामोफ़ोबिया [इस्लाम धर्म मानने वालों के लिए हिंसा और घृणा का रवैया] हिंदुत्व का एक अभिन्न अंग बन चुका है।[14]
4. म्यांमार (बर्मा) सैन्य शासकों के साथ आरएसएस का याराना।
यह केवल मुसोलिनी और हिटलर ही नहीं हैं जो आरएसएस के प्रिय हैं। वस्तुतः आधुनिक विश्व की विशम सर्वसत्तावादी विचारधाराएं तथा शसन भी आरएसएस के लिए विषेश आकर्शण रहे हैं। पूरा विश्व हमारे पड़ोसी देश बर्मा में सैनिक श सक गिरोह-जो विश्व में सबसे बड़ा नषीली दवा का धंधा भी चलाता है के बारे में विश्व कुछ भी क्यों न कहता रहे, पर आरएसएस ने बड़ी निर्लज्जता से लोकतंत्र के हत्यारे इस गिरोह से घनिश्ठ संबंध बना रखे हैं। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गेनाइज़र’ ने (28 फ़रवरी-5 मार्च 2002) बर्मा स्थित अपने संवाददाता की एक रपट “सनातन धर्म स्वयं सेवक संघ 50 वर्ष का हैः म्यान्मार के मंत्री इस अवसर पर उपस्थित हुए”, शीर्षक से प्रकाशित की जिसमें बताया गयाः
सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ (एसडीएसएस) की 50वीं वर्षगांठ हाल ही में यांगोन के मायोमा क्योंग स्ट्रीट पर नेश नल थिएटर में आयोजित हुई। स्टेट पीस एंड डेवेलपमेंट कौंसिल (सैनिक शसकों की टोली) के सचिव-2 ले. जनरल तिन ओ ने बैठक में भाग लिया। इस कार्यक्रम में मंत्रियों एवं वरिश्ठ सैनिक अधिकारियों ने भी भाग लिया। वाणिज्य मंत्री ब्रिगेडियर जनरल रची सोने, समाज कल्याण, राहत एवं पुनर्वास मंत्री मेजर जनरल सीन हतवा, स्वास्थ मंत्री मेजर जनरल केत सीन उन प्रमुख व्यक्तियों में थे जिन्होंने समारोह में भाग लिया।... सचिव-2 ने समारोह में मुख्य भाशण दिया।
इस रिपोर्ट के साथ दो फोटो भी प्रकाशित किये गये हैं। एक फोटो में सैनिक श सक टोली के दूसरे वरिश्ठतम श सक ले. जनरल तिन ओ समेत पांच सैनिक जनरल मंच पर आरएसएस यूनिफ़ार्म वाली ख़ाकी चढ्ढी पहने एसडीएसएस नेतृत्व के बीच में बैठे हैं। दूसरे फोटो में सभागार की प्रथम पंक्ति में बर्मी सैनिक श सकों के मुख्य अधिकारी बैठे दिखाये गये हैं।
म्यांमार के सैन्य शासकों के साथ पुराने रिश्तों के रहते म्यांमार में सताए गए रोहिंग्याओं के प्रति आरएसए-भाजपा के भारतीय शासकों का शत्रुवत व्यवहार न तो घटनावश है न ही आकस्मिक। मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने म्यांमार के शासकों का साथ देते हुए यह मानने से इंकार कर दिया कि बर्मा में रोहिंग्याओं का जनसंहार किया जा रहा है। हज़ारों की संख्या में सताए गए रोहिंग्या जान बचाकर भारत भाग आए थे। उन्हें भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
5. यूरोप में फ़ासिस्टों के पुनरोत्थान से आरएसएस में जश्न
20 वीं शताब्दी की शुरुआत में फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में फ़ासिस्ट समूहों के पुनरुत्थान से जिस समय यूरोप स्तब्ध था, सर्वसत्तावादी विचारों से ओतप्रोत आरएसएस हर्षोल्लास से उत्सव मना रहा था। उसने इसे “राष्ट्रवाद” और “देशभक्ति” का पुनरुत्थान बताया। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गेनाइज़र’ (26 मई, 2002 का अंक) में में बताया गया:
11 सितंबर के बाद का विश्व रहने के लिए एक भिन्न क़िस्म का स्थान हो गया है। विश्व भर में लोग अब अधिकाधिक राष्ट्र वादी और देश भक्त होते जा रहे हैं...हाल ही में फ्रांस में हुए राष्ट्रपति के चुनाव ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दे दिया है कि उग्र-राष्ट्र वादी जीन मार्टी ली पेन को व्यापक समर्थन मिला। हालांकि चुनाव में वे हार गये, लेकिन विश्व मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार वे करीब 60 लाख वोट पाने में सफल रहे जो उदार तथा वामपंथी प्रतिष्ठान एवं मीडिया द्वारा उनके ख़िलाफ़ शुरू किये गये घृणा अभियान के मद्देनज़ र कोई छोटी सफलता नहीं थी। और केवल वही नेता एवं पार्टियां नहीं हैं जिन्होंने अपने-अपने देशों में राष्ट्र वाद की भावनाओं के पुनरूत्थान के कारण सफलता पायी है।
जर्मनी जैसे दूसरे अन्य महत्वपूर्ण देश में भी ऐसी ही राजनीतिक परिघटना देखने को मिल रही है। रोनाल्ड रिकल्ल के उदय ने अनेक कम्युनिस्ट हमदर्दों को ठंडा कर दिया है। आस्ट्रिया में एक साझा सरकार क़ायम हुई है जिसमें जोर्ग हैदर की उग्र राष्ट्र वादी फ़्रीडम पार्टी एक घटक है। यह एक आंख खोल देने वाला मामला है। जब वे सत्ता में आये तो वामपंथी लाबी ने ‘आसमान गिरने’ का षोर मचाना शुरू कर दिया। फ़्री डम पार्टी दूसरे घटकों की ही तरह सत्ता साझेदार रही है। अभी तक आस्ट्रिया ने कोई बड़ी दक्षिणपंथी विपदा नहीं देखी है जिसकी धारणा कम्युनिस्ट प्रचार मषीनरी ने निर्मित करने की कोशिश की थी। अन्य अनेक यूरोपीय देश भी ऐसी ही प्रवृत्ति देख रहे हैं।
6. नस्लवादी आरएसएस नाज़ी जर्मनी की तरह चला रहा है श्रेष्ठ आर्य बच्चे पैदा करने की परियोजना।
आरएसएस मुसलमानों और ईसाइयों के ख़ात्मे के लिए नाज़ी वादियों द्वारा यहूदियों के साथ किए गए उदाहरण का अनुसरण करने का पक्षधर तो है ही, श्रेष्ठ नस्ल के “आर्य”बच्चे पैदा करने के मामले में भी वह हिटलर का अनुयायी है। हिटलर के समय जर्मनी में ‘आर्य’ बच्चों को पैदा करने की एक योजना चलार्इ गर्इ थी। आरएसएस ने भारत में भी श्रेष्ठ नस्ल के बच्चे पैदा करने की योजना शुरू की है। आरएसएस ने आधिकारिक तौर पर बताया है कि उसका एक जेबी संगठन ‘गर्भ विज्ञान संस्कार’ (Uterus Science Culture) वैदिक उपदेशों और जर्मनी में किए गए प्रयोगों को आधार बनाकर, भारत के कर्इ हिस्सों में ‘गोरे’ और ‘लंबे’, ज़रुरत के अनुसार ‘उत्तम नस्ल’के बच्चों की पैदाइश के लिए ज़िन्दा व्यक्तियों पर परीक्षण कर रहा है। आरएसएस की इस योजना के बारे में आरोग्य भारती (आरएसएस का स्वास्थ्य प्रकोष्ठ) के संयोजक डॉ. हितेश जानी का कहना है, “जिन मां-बाप के बच्चे छोटे और काले हैं वे शुद्ध नहीं हैं।सौभाग्य से “शुद्ध बच्चों के जनन का नियमानुसार तरीक़ा बहुत ही सरल है। इसके लिए इन माता-पिता को चंद्र पंचांग के अनुसार आचार-व्यवहार करना होता है। उन्हें ज्योतिषीय पंचांग के अनुसार सहवास, खान-पान, सुनने और सोचने इन सब का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ऐ सा करने से वे अपने परिपक्व यौन प्रजनन कोशिका में गुणसूत्रों (क्रोमोसाम) के अग्रभाग पर मौजूद पाप को साफ़ करके उसे परिशुद्ध कर सकेंगे।”15
भारत के एक प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक से बात करते हुए, आरएसएस के शीर्ष पदाधिकारी ने इस योजना को “सर्वोच्च-प्राथमिकता” वाली योजना बताते हुए संबंधित तथ्यों के बारे में यह जानकारी साझा की :
एक दशक पहले गुजरात में इसको शुरू किया गया था।2015 में इसे देश भर में शुरू किया जा चुका है। संघ की शैक्षणिक शाखा विद्या भारती के सहयोग से इस परियोजना की लगभग 10 शाखाएं गुजरात और मध्य प्रदेश में हैं, और जल्द ही उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में और अधिक इकाइयां प्रारंभ होने वाली हैं।16
परियोजना के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. करिश्मा मोहनदास नरवानी के अनुसार,
हमारा मुख्य उद्देश्य उत्तम संतति(सर्वश्रेष्ठ बच्चों) के माध्यम से समर्थ भारतबनाना है। 2020 तक ऐसे हज़ा रों बच्चे हमारा लक्ष्य है।17
इस ‘अद्भुत कार्यक्रम’के प्रबंधकों के अनुसार, “यह परियोजना आरएसएस के एक वरिष्ठ विचारक द्वारा 40 साल पहले दिए गए सुझाव से प्रेरित है। इन महानुभाव के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दो दशकों के भीतर जर्मनी में आयुर्वेदिक पद्घति के माध्यम से ‘विशिष्ट’बच्चों को जन्म दिला कर जर्मनी को पुनर्गठित किया था।“डॉ. अशोक कुमार वाष्णेय, 30 साल से अधिक समय से आरएसएस के पूर्ण-कालिक कार्यकर्ता और ‘आरोग्य भारती’के राष्ट्रीय सांगठनिक सचिव रहे हैं। उनका कथन है कि भारत में जामनगर (गुजरात) में एक विश्वविद्यालय और इसके अलावा दो अन्य संस्थानचिल्ड्रन यूनिवर्सिटी (गांधीनगर) और अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय (भोपाल) के पाठ्यक्रम में ‘गर्भ विज्ञान संस्कार’सम्मिलित किया जा चुका है।
इस परियोजना का दावा है कि अब तक 450 “विशिष्ट बच्चों” का सुरक्षित जनन हो चुका है। 2020 तक हर राज्य में एक गर्भ विज्ञान केंद्र, एक सुविधा केंद्र क़ा यम करना लक्ष्य रखा गया था। इस परियोजना का उद्देश्य है महिलाएं “उत्तम संतति”;अर्थात “आदर्श”, “विशिष्ट बच्चे” को जन्म दे सकें। इसके लिए माता-पिता को तीन महीने तक “शुद्धिकरण” प्रक्रिया का अनुपालन आवश्यक है। इसमें ग्रह-नक्षत्रों की चाल की गणना करके संभोग के लिए समय निर्धारित किया जाता है। गर्भ ठहरने के बाद पूर्ण परहेज(संभोग से),निर्धारित आचार-व्यवहार तथा आहार संबंधी नियमों का सख्ती के साथ पालन करना होता है।
‘लंबे’और ‘गोरे’ बच्चों को पैदा करने के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए दिल्ली, मुंबई , कोलकाता जैसे महानगरों और उडुपी (कर्नाटक), कासरगोड (केरल), विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा (आंध्र प्रदेश), रोहतक और गुड़गांव (हरियाणा)जैसे छोटे शहरों में कई सेमिनार और परामर्श सत्र आयोजित किए गए हैं। आरएसएस को उम्मीद थी कि 2020 तक देश में हज़ारों “आदर्श शिशु” होंगे।
आरएसएस का नज़रिया नस्लवादी है। “गोरी चमड़ी” वाली नस्ल से लगाव एक ख़ास क़िस्म की वैचारिक विरासत का अंग है, जिसके अनुसार भारतीय आर्य गोरे, लंबे, माननीय, सम्माननीय, अभिजात्य और संस्कृत भाषी थे। आरएसएस आर्यों को श्रेष्ठ मानता है, उसकी मान्यता यह भी है कि उत्तर भारत के केवल हिंदू ब्राह्मण ही आर्य नस्ल से संबंधित हैं। हम इस विषय पर अन्यत्र विस्तार से चर्चा करेंगे।
आर्यों की श्रेष्ठता के प्रति आरएसएस का विश्वास जर्मनी के हिटलर और उसकी नाज़ी पार्टी का ही अनुकरण है। जर्मनी में यहूदियों का जनसंहार किया गया था इससे संबंधित एक संग्रहालय अमेरिका में(United State Holocaust Memorial Museum) है। इसकी वेबसाइट के अनुसार, जर्मनी के चांसलर बनने से पहले ही एडोल्फ़ हिटलर पर आर्य नस्ल की श्रेष्ठता का जुनून सवार था। वह नस्लीय “शुद्धता” और “जर्मन नस्ल” की श्रेष्ठता पर यकीन करता था। इस सोच के आधार पर ही हिटलर ने आर्यों को “श्रेष्ठ नस्ल”बताया था। उसने एलान किया था कि वह दिन दूर नहीं है जब सारी दुनिया पर आर्य राज करेंगे। इसके लिए जरूरी है कि वे नस्ल की शुद्ध ता बनाए रखें। हिटलर के अनुसार, शुद्ध आर्यगोरा, नीली आंखों वाला और लंबा होता है।18
हिटलर और नाज़ियों के सत्ता पर क़ा बिज होने के बाद, उनका यह सोच राज्य की विचारधारा बन गया। पोस्टर, रेडियो, फिल्म,समाचार पत्रों, विद्यालयों के पाठ्यक्रम आदि के माध्यम से इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया। जर्मन वैज्ञानिकों के समर्थन से नाज़ियों ने अपनी इस विचारधारा को व्यवहार में लागू करना शुरू किया। माना गया कि “हीन” (गैर आर्य) लोगों के प्रजनन को सीमित करके ही मानव जाति को बेहतर बनाया जा सकता है। 1933 में, जबरन नसबंदी करने की इजाजत जर्मनी के डॉ क्टरों को दे दी गई,पीड़ितों के ऐसे ऑपरेशन किए जाने लगे कि वे बच्चे पैदा करने के लिए नाक़ा बिल हो जाएं। इस प्रकार के व्यापक कार्यक्रम में रोमा (जिप्सी) अल्पसंख्यकों को ख़ास निशाना बनाया गया।जर्मनी में इनकी संख्या लगभग 30,000 थी। पीड़तों में विकलांग व्यक्ति,मानसिक रूप से बीमार, जन्म से ही मूक-बधिर और अंधे लोग भी थे। इनके अलावा, पीड़ितों में लगभग 500 अफ़्री की-जर्मन बच्चे भी थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मन के राइनलैंड क्षेत्र पर मित्र देशों के कब्जा कर लिया था। ये बच्चे आपनिवेशिक सेना में अफ़्रीकी सैनिकों और जर्मन माताओं की संतान थे।19
‘मास्टर रेस’ तैयार करने की आरएसएस की इस परियोजना का मक़ सद शुद्ध नस्ल के गोरे , लम्बे कद के विशिष्ट बच्चों की फ़सल तैयार करना है। यह नाज़ियों के“लीबेंसबोर्न” (जीवन का स्रोत) कार्यक्रम की अनुकृति है। “लीबेंसबोर्न” कार्यक्रम शुद्ध आर्य जाति के बच्चों के प्रजनन की परियोजना थी, जिसके तहतनाज़ी सिद्धांतकार और नेताहेनरिक हिमलर की प्रत्यक्ष देखरेख में गोरे लंबे कद के बच्चे पैदा करने के लिए “शुद्ध- रक्त” वालीमहिलाओं को प्रोत्साहित किया गया था। “लीबेंसबोर्न” कार्यक्रम के अनुसार जर्मनी में लगभग 8,000 और नॉर्वे में लगभग 12,000 बच्चों का जन्म हुआ।20रोचक तथ्य यह है कि इन बच्चों में से अधिकांश गोरे-लंबे और नीली आंख-भूरे बालों वाले नहीं थे, जबकि इस मानवद्वेषी जानलेवा नस्लीय नीति का यह अभिन्न अंग था। इस नस्लवादी नीति का मक़ सद ही था शुद्ध आर्य बच्चे पैदा करना और यहूदियों जैसे गैर-आर्य लोगों को मलियामेट कर देना है। नाज़ी वाद की इस नीति के बदौलत 60 लाख लोग मारे गए और वंशानुगत बीमारियों से ग्रसित लोगों की जबरन नसबंदी करार्इ गर्इ थी।
आरएसएस की “उत्तम संतति”परियोजना गोरे और लंबे कद के “विशिष्ट बच्चे”पैदा करने से की योजना पहले पड़ाव पर ही नाज़ी नस्लवादी परियोजना, “लीबेंसबोर्न”के अनुसार चलाने की कोशश की जा रही है। इसका स्वभाविक अगला कदम नाज़ियों की तरह जनसंहार है। उन सभी भारतीयों को समाप्त करना जो शुद्ध “आर्य” नहीं हैं। ग़ौर तलब है, हिंदुत्व गिरोह ऐतिहासिक रूप से नाज़ी आदर्शों का उपासक रहा है। आरएसएस के सबसे प्रमुख विचारक (गोलवलकर) ने 1939 में नफ़रत फैलाने वाली एक अत्यंत कुत्सित पुस्तक “हम या हमारे राष्ट्र की परिभाषा” (We or Our Nationhood Defined) लिखी थी। इसमें न केवल हिटलर के द्वारा लाखों यहूदियों के जनसंहार को गौरवान्वित किया गया, भारत में हिंदुत्ववादी संगठनों को परामर्श भी दिया है कि मुसलमान और ईसाई “आर्य” नहीं हैं, इनका सफ़ाया करने के लिए नाज़ियों का अनुकरण करें। 21 बहरहाल, हिंदुत्ववादी वैज्ञानिकों और उन्मादित भीड़ को भड़काकर हत्या (लिंचिंग) किए जाने में शिकार केवल मुस्लिम और ईसार्इ ही नहीं है, अधिकांश दक्षिण भारतीय भी उनके निशाने पर हैं, जिन्हें काला घोषित किया जा चुका है।
7. लोकतांत्रिक भारत के प्रति आरएसएस की नफ़रत।
आरएसएस लोकतंत्रा के सिद्धांतों के विपरीत लगातार यह मांग करता रहा है कि भारत में तानाशाही शासन हो। गोलवालकर ने सन् 1940 में आरएसएस के मुख्यालय, रेशम बाग़ में आरएसएस के 1350 उच्चस्तरीय कार्यकर्ताओं के सामने भाषण करते हुए घोषणा कीः
एक ध्वज के नीचे, एक नेता के मार्गदर्शन में, एक ही विचार से प्रेरित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व की प्रखर ज्योति इस विशाल भूमि के कोने-कोने में प्रज्जवलित कर रहा है।
याद रहे कि एक झण्डा, एक नेता और एक विचारधारा का यह नारा सीधे यूरोप की नाज़ी एवं फ़ासिस्ट पार्टियों, जिनके नेता क्रमशः हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह थे, के कार्यक्रमों से लिया गया था।
स्वतंत्रता की पूर्व-संध्या पर (14 अगस्त 1947) इसके इसी अंग्रेज़ी मुखपत्र में संपादकीय द्वारा भारतीय राष्ट्र की निम्नलिखित परिभाषा दी गयीः
राष्ट्रत्व की छद्म धारणाओं से गुमराह होने से हमें बचना चाहिए। बहुत सारे दिमाग़ी भ्रम और वर्तमान एवं भविष्य की परेशानियों को दूर किया जा सकता है अगर हम इस आसान तथ्य को स्वीकारें कि हिंदुस्थान में सिर्फ़ हिंदू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं और राष्ट्र का ढांचा उसी सुरक्षित और उपयुक्त बुनियाद पर खड़ा किया जाना चाहिए...स्वयं राष्ट्र को हिंदुओं द्वारा हिंदू परम्पराओं, संस्कृति, विचारों और आकांक्षाओं के आधार पर ही गठित किया जाना चाहिए।
8. विश्व में आरएसएस इकलौता सांस्कृतिक-धार्मिक संगठन जो हथियारों की पूजा करता है।
आरएसएस का दावा है कि वह एक सांस्कृतिक संगठन और दुनिया के हिंदुओं का सबसे बड़ा संगठन है। चौंकाने वाली बात यह है कि विश्व-भर में यह अकेला ऐसा सांस्कृतिक-धार्मिक संगठन है जो धार्मिक त्योहारों के नाम पर खुलेआम हथियारों की पूजा किया करता है। आरएसएस की स्थापना विजय दशमी (दशहरा; रावण पर भगवान राम का जीत का दिन) के दिन 1925 में हुयी थी। हर साल इस दिन आरएसएस अपने प्रमुख वार्षिक कार्यक्रम का अयोजन करता है। इस आयोजन का सब से महत्पूर्ण हिस्सा है आरएसएस के मुखिया (सरसंधचालक) दुवारा “शस्त्र-पूजा” (हथियारों की पूजा) किया जाना। वर्तमान आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने हर साल की तह 25 अक्टूबर, 2020 को ‘शस्त्र पूजा’ को एक हिंदू त्योहार के रूप में मनाया और इस तरह आरएसएस की फ़ासीवादी विरासत को एक बार फिर रेखांकित किया।[15]
सब से शर्मनाक यह है कि हिंसा के प्रतीक “शस्त्र-पूजा” की परम्परा को नरेंद्र मोदी ने बहैसियत गुजरात के मुख्यमंत्री अपनाया था और इसे एक राजकीय समारोह की हैसियत प्रदान की थी। लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत के इतिहास में पहली बार देखा गया कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन कोई नेता देश के संविधान को न पूज कर हथियार पूज रहा था। मोदी द्वारा
‘शस्त्र-पूजा’ ‘की तस्वीरों को सरकारी तौर पर व्यापक रूप से प्रसारित किया गया जो देश के प्रजातान्त्रिक ढांचे के लिए एक दिल दहलाने वाली बात थी। हिटलर और मुसोलिनी तक ने भी कभी हथियारों के प्रति इस प्रकार का लगाव का सार्वजनिक प्रदर्शन किया हो, इतिहास में ऐसी नज़ीर नहीं मिलती।[16]
नागरिक समाज के कड़े विरोध के बावजूद हथियारों की पूजा का यह सिलसिला जारी है। डॉ भीम राव अंबेडकर के पौत्र प्रकाश अंबेडकर ने इस पर चिंता ज़ा हिर करते हुए कहा:
देश में शस्त्र अधिनियम है, जिसके अंतर्गत किसी भी के लिए [बिना लाइसेंस] हथियार रखने पर रोक है। आरएसएस के लोग खुले आम हथियारों के साथ देखे जा सकते हैं। ऐसी तस्वीरें प्रचारित की जा रही हैं, जिनमें मोहन भागवत (आरएसएस मुखिया) और नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री) एके 47, स्वचालित बंदूकों (मल्टी-फ़ायरिंग गन), कंधो पर रखकर रॉकेट दागने जैसे हथियार लिए हुए हैं। मैंने सरकार से पूछा है उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है।[17]
9. कांग्रेसी नेताओं की हत्या का आह्वान, मुसलमानों और र्इसार्इ डकैत घोषित।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने गुप्तचर विभाग की सूचनाओं के हवाले से लिखा है कि 6 दिसंबर, 1947 को, गोलवलकर ने दिल्ली के समीप मथुरा के एक शहर गोवर्धन में आरएसएस कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलार्इ थी। इसमें चर्चा का विषय था कि :
कैसे कांग्रेस के मुख्य नेताओं को मारा जाए ताकि जनता आतंकित हो जाए और उसे अपने नियंत्रण में किया जा सके…दो दिन बाद, गोलवलकर ने दिल्ली के रोहतक रोड शिविर में कई हज़ार स्वयंसेवकों की भीड़ को संबोधित किया। वहां तैनात स्थानीय गुप्तचर विभाग (LIU) की रिपोर्ट के अनुसार आरएसएस के नेताओं ने अपने वक्तव्यों में कहा था किसंघ तब तक चैन नहीं लेगा, जब तक पाकिस्तान का खत्मा नहीं हो ता। ऐ सा करने में अगर कोई बाधक बनता है, तो हमें उसे भी खत्म करना होगा, चाहे वह नेहरू सरकार हो या कोई अन्य सरकार...मुसलमानों का ज़िक्र करते हुए कहा गया था, पृथ्वी पर कोई शक्ति नहीं है, उन्हें हिंदुस्तान में सुरक्षा प्रदान कर सके। उन्हें चाहिए वे देश छोड़ करके चले जाएं...अगर उन्हें यहां रहने दिया गया तो उनके साथ जो होगा तो इसके लिए ज़िम्मेदार सरकार होगी, हिंदू समुदाय नहीं। महात्मा गांधी हिंदुओं को अब और गुमराह नहीं कर सकते। हमारे पास ऐसे साधन हैं जिनके द्वारा (हमारे) विरोधियों को तुरंत शांत किया जा सकता है।
छह हफ्ते बाद, गांधीजी की हत्या कर दी गई। गोलवलकर और उनके सहयोगियों को जेल में बंद कर दिया गया। एक साल बाद, नेकचलनी के वचन-पत्र पर उनकी रिहार्इ हुर्इ। इसके बावजूद, वे अपने विचारों पर अड़े रहे। गोलवलकर का ख़ुद का यह तर्क था, ‘यह देश केवल हिंदुओं का है, पारसी और यहूदी यहां मेहमान हैं और मुसलमान और ईसाई डकैत हैं।’23
10. गोलवलकर ने भारतीय स्वतंत्रता के समय मुसलमानों के ख़ात्मे के लिए योजना बनार्इ थी।
जिस समय देश आज़ाद हुआ, गोलवलकर के नेतृत्व में आरएसएस भारत से मुसलमानों को साफ़ करने के लिए कटिबद्घ था। गोलवलकर ख़ुद इस हैवानी योजना को अंजाम देने में शरीक थे। वरिष्ठ अधिकारी, उत्तर प्रदेश के प्रथम गृहमंत्री राजेश्वर दयाल ने इस बारे में अपनी आत्मकथा में लिखा है :
‘जब सांप्रदायिक तनाव अभी भी अपनी परिकाष्ठा पर था तो पश्चिम रेंज के डिपुटी इंस्पेक्टर जनरल बी.बी. जेटली जो एक अत्यंत अनुभवी एवं क़ा बिल अधिकारी थे, बहुत गोपनीय तरीक़े से मेरे घर पहुंचे। उनके साथ पुलिस के अधिकारी भी थे जो अपने साथ बाक़ाएदा ताले लगे हुए लोहे के दो संदूक भी लाये थे। जब इन संदूक़ों को खोला गया तो उनमें एक कायरतापूर्ण शडयंत्र के न झुठलाये जाने वाले सबूत थे जिनके द्वारा प्रांत के पश्चिम ज़िलों में खून की होली खेली जानी थी। संदूक़ों में ऐसे नक्षे भरे थे जिनमें पेशवराना और बहुत तथ्यात्मक तौर पर उस बड़े इलाके के हर गांव और श हर में मुस्लिम आबादी और मोहल्लों की निश नदेही की गयी थी। उनमें इन जगहों पर पहुंचने के विस्तृत निर्देश और दूसरी चीजें थीं जिनसे एक दुश्ट उद्देष्य का पता चलता था…
इस रहस्योद्घाटन से काफ़ी चिन्तित होकर मैं तुरंत पुलिस दल को प्रधानमंत्री (उन दिनों मुख्यमंत्री को इस नाम से ही जाना जाता था) के घर ले गया। वहां एक बंद कमरे में जेटली ने अपनी खोज की एक पूरी रपट लोहे के बंद संदूक़ों में सबूतों के साथ पेश की। ठीक समय पर आरएसएस के ठिकानों पर छापे मारे जाने की वजह से इस बड़े शड़यंत्र का भंडाफोड़ हो पाया था। यह पूरा शडयंत्र इस संगठन के मुखिया के निर्देषों तथा देखरेख में ही संगठित किया गया था। जेटली और मैंने मुख्य अभियुक्त श्री गोलवलकर की तुरंत गिरफ्तारी के लिए जोर दिया जो अभी भी उसी इलाके में थे।
पंत जी (जी.बी. पंत) ने जो कुछ देखा और सुना था उस पर भरोसा करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था और उन्होंने गंभीर चिन्ता जतायी, लेकिन सरगना की तुरंत गिरफ्तारी के लिए सहमत होने की बजाय जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे और जो किदवई (एक मंत्री) कर देते, उन्होंने इस मामले को मंत्रिमंडल की अगली बैठक में रखे जाने के निर्देश दिये।
आख़िरकार जो निकलकर सामने आया वह यह कि श्री गोलवलकर के नाम एक पत्र जारी किया जाये जिसमें उन सबूतों और पाये गये सामान की जो सूची मिली है, उसके बारे में जवाब तलब किया जाये…पत्र को उसी समय पहुंचाने का निर्णय लिया गया और उसकी ज़िम्मेवारी दो पुलिस अधिकारियों को दी गयी।
पर गोलवलकर को सावधान कर दिया गया और वे उस क्षेत्र में कहीं भी नहीं मिले। वे दक्षिणी दिशा में जाते हुए पाये गये पर वे अपना पीछा करने वालों को चकमा देकर बच निकले। उनकी यह नाकाम खोज एक स्थान से दूसरे स्थान में चलती रही और कई सप्ताह बीत गये।
30 जनवरी 1948 का दिन आया जब महात्मा, षांति के सर्वोच्च दूत एक कट्टर आरएसएस उन्मादी की गोली के शिकार हो गये। इस अत्यंत त्रासद घटना ने मुझे मर्माहत कर दिया। [18]
निश्चित रूप से पंत, कांग्रेस पार्टी में आरएसएस के भेदिए थे। क्षेत्र में गोलवलकर की मौजूदगी के बावजूद, उनके उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। उन्हें मुसलमानों का संहार करने के इस प्रयास के लिए कभी भी आरोपित नहीं किया गया।
11. एक वरिष्ठ आरएसएस सदस्य द्वारा एक मुस्लमान लड़की की निर्मम हत्या के लिए एक जघन्य औचित्य।
आरएसएस के हत्यारे भारत विभाजन के दौरान हत्या के नए प्रयोग किस प्रकार कर रहे थे, यह आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता द्वारा दिए गए उसके विवरण से साफ़ पता चल जाता है। यह विवरण आरएसएस के पूर्णकालिक वरिष्ठ प्रचारक कृष्ण गोपाल रस्तोगी ने ‘आपबीती’ नामक अपनी आत्मकथा में दिया है। इसमें उसने उस घटना का वर्णन किया है, जिसमें वे स्वयं मुसलमानों के ख़िलाफ़ हथियारबंद हिंदुओं के एक समूह का नेतृत्व कर रहा था । इस भीड़ ने रुड़की और हरिद्वार के बीच स्थित कलियर (अब उत्तरप्रदेश में) पर हमला किया तथा बिना किसी ग्लानि के सब लोगों को मार डाला, यहां तक कि एक निहत्ती मुस्लमान लड़की तक को नहीं छोड़ा। दिल दहला देने वाली इस घटना का वर्णन रस्तोगी ने इस प्रकार किया हैः
मैं मुसलमानों के एक पुराने मुहल्ले में था। उनके पास छुरे, भाले, बंदूकें इत्यादि शस्त्र थे तथा वे किसी भी स्थिति से निपटने को तैयार थे। जब मुझे लगा कि उनका इरादा हिंदू बहुल इलाकों पर हमला करने का है तो मैंने 250 लोगों को इकट्ठा किया, जिनमें कुछ जाने-पहचाने गैंगस्टर्स भी थे और कलियर पर हमला कर दिया। इस हमले में एक आश्चर्यजनक घटना हुई। एक घर में घुसकर जब हम पुरुषों की हत्या कर रहे थे, तभी हमें एक अति सुंदर लड़की दिखी। मेरे साथ वाले हत्यारे उसका रूप देख अचंभित रह गए। उस लड़की को पाने के लिए उन्होंने आपस में लड़ना शुरू कर दिया। मेरे लिए यह एक अत्यंत दुविधाजनक स्थिति थी और समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। मैंने अपनी ओर से हरसंभव प्रयत्न किया कि हत्यारे अपने मूल कार्य पर ध्यान लगाएं। मैंने उन्हें गालियां दीं तथा धमकाया भी लेकिन वे मेरी एक नहीं सुन रहे थे कि अचानक मुझे हल सूझ गया। इस सारी समस्या की जड़ वह सुंदर कन्या थी और अब उसे मरना था। मैंने अपनी बंदूक ली और उसे गोली मार दी। वह मर गई। इससे मेरे साथी सन्न रह गए तथा वे फिर अपने काम से लग गए। हालांकि यह महिलाओं पर हाथ न उठाने के हमारे आदर्श के ख़िलाफ़ था लेकिन ऐसी आपात स्थिति में यह करना पड़ा तथा मुझे अब तक इसका दुख है।[19]
12. देश विभाजन के दौरान मुसलमानों के संहार के लिए सरदार वल्लभार्इ पटेल ने भी आरएसएस को लताड़ा था।
जग ज़ाहिर है कि भारत के तत्कालीन गृह मंत्रीसरदार वल्लभ भाई पटेल आरएसएस के प्रति कुछ नरम थे और वे आरएसएस के लिए आज भी प्रिय हैं। बहरहाल, देश के विभाजन के बाद हुए दंगों और इसमें मुसलमानों के व्यापक स्तर पर हुए संहार में आरएसएस की भूमिका का बचाव करना उनके लिए भी कठिन हो गया। सरदार पटेल ने 11 सितंबर 1948 को गोलवलकर (आरएसएस के तत्कालीन सुप्रीमो) को लिखे पत्र में कहा:
हिन्दुओं का संगठन करना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रश्न है।[20]
13. मोदी राज में आरएसएस के आतंक के विरोध में उच्च पदस्थ भारतीय पुलिस अधिकारी का दर्द।
इस तरह के कर्इ उदाहरण हैं, जब ईमानदार अफ़सरों ने आरएसएस की आतंकवादी गतिविधियों को सार्वजनिक संज्ञान में लाने का साहस किया है। मोदी को पहली बार प्रधानमंत्री (2014) बने एक साल भी नहीं हुआ था कि आरएसएस ने देश में असहिष्णुता, नफ़रत और अल्पसंख्यकों को आतंकित करने का जो सिलसिला शुरू किया, इसका विस्तार से विवरण भारत के अति-अलंकृत पुलिस अधिकारियों में से एक जूलियो रिबेरो ने पेश किया। रिबरो रोमानिया में राजदूत रह चुके हैं और उन्हें देश के प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कार पद्म भूषण से भी नवाज़ा जा चुका है। हिंदुत्ववादियों के व्यवहार से एक आतंकित र्इसार्इ के बतौर उन्होंने मार्च 17, 2015 को लिखे अपने एक लेख में बताया
आज, जब में 86वें साल में हूं, मैं अपने ही देश में धमकाया हुवा, अपेक्षित और अजनबी बना दिया गया लगता हूँ। काम से काम हिन्दू राष्ट्र के झंडाबरदारों की निगाह में तो मैं अब क़तई भारतीय नहीं हूँ। यह महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है या एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा की मई (2014) में नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही एक छोटे और शांति-प्रिय समुदाय को संयोजित हमलों का निशाना बनाया गया है? ‘घर वापसी’, क्रिसमस दिवस को ‘सुशासन दिवस’ घोषित करना, दिल्ली में ईसाई पूजा स्थलों और शिक्षा-संस्थाओं पर हमलों ने शांति-प्रिय ईसाईयों को एक ऐसे अहसास से जकड़ दिया है मानो वे घेर लिए गए हों। यह भयंकर है की ये [हिंदुत्ववादी] चरमपंथी नफ़रत और अविश्वास के माहौल में सीना ज़ोरी में तमाम सीमाएं लांघ गए हैं।
ईसाई आबादी जो देश की कुल जनसंख्या की मात्र 2 फ़ीसदी है पर लगातार गहरे आघात किए जा रहे हैं। अगर यह चरमपंथी बाद में मुसलमानों को निशाना बनाएँगे, जो इनका असली उद्देश्य भी है, तो उसके जो परिणाम होंगे उस के बारे में सोचकर इस लेखक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।[21]
गोलवलकर के पसंदीदा, आरएसएस के स्वयं सेवक नरेन्द्र मोदी जिस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, वहां गुजराती मुसलमानों के साथ क्या हुआ इसे भारत के एक प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में संपादकीय से समझा जा सकता है, जिसमें बताया गया:
पिताओं के सामने उनकी पुत्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर उनके सरों पर प्रहार किया गया। उनके पिताओं पर पेट्रोल छिड़ककर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया। उनकी संपत्ति लूट ली गयी। उनके व्यवसाय नश्ट कर दिये गये और पुलिस सब कुछ चुपचाप देखती रही एवं कुछ भी नहीं किया।[22]
14. आंतिरक ख़तरा नंबर- एक हैं भारतीय मुसलमान और नंबर- दो र्इसार्इ।
गोलवलकर की पुस्तक ‘विचार नवनीत’ (Bunch of Thoughts) आरएसएस के स्वयं सेवकों के लिए पवित्र पुस्तक है। इस पुस्तक में ’आंतरिक खतरे’ शीर्षक से एक विस्तृत अध्याय है, जिसमें मुसलमानों और ईसाइयों को क्रमशः ख़तरा नंबर एक और दो बताया गया है। पुस्तक में इससे संबंधित अध्याय की शुरुआत इस प्रकार होती है :
संसार में अनेकों देश के इतिहास का यह दुःखद सबक रहा है कि राष्ट्र की सुरक्षा को बाहरी आक्रान्ताओं की अपेक्षा आन्तरिक विरोधी तत्व अधिक बड़ा संकट उपस्थित करते हैं। दुर्भाग्यवश, जब से अंगे्रजों ने इस देश को छोड़ा, हमारे देश देश में राष्ट्र की सुरक्षा का यह प्रथम पाठ सतत उपेक्षित रहा है। [23]
मुसलमानों को दुश्मन नंबर एक बताते हुए वे आगे कहते हैं-आज भी अनेक ऐसे लोग हैं जो यह कहते हैं कि “अब मुसलमान समस्या बिलकुल नहीं रही। पाकिस्तान को प्रश्रय देने वाले वे सब दंगई तत्व सदा के लिए चले गये हैं। शेष मुसलमान हमारे देश के भक्त हैं। आख़िर उनके लिए जाने को कहीं कोई स्थान नहीं है और वे निश्ठावान बने रहने के लिए बाध्य हैं।...इस प्रकार के धोखे में रहना आत्मघाती होगा। इसके विपरीत पाकिस्तान के निर्माण से यह मुस्लिम विभीषिका सैकड़ों गुनी बढ़ गई है, जिसका निर्माण ही हमारे देश पर भावी आक्रमण की योजनाओं के आधार रूप में हुआ है।[24]
आम मुसलमानों के ख़िलाफ़ जहर उगलते हुए आगे कहा गया है :
निष्कर्ष यह है कि प्रायः हर स्थान में ऐसे मुसलमान हैं जो ट्रांसमीटर के द्वारा पाकिस्तान से सतत सम्पर्क स्थापित किये हैं और अल्पसंख्यक होने के नाते, सामान्य नागरिक के ही नहीं अपितु कुछ विषेशाधिकारों तथा विषेश अनुग्रहों का भी उपभोग करते हैं। [25]
उनके अनुसार भारत में हरेक मुसलमान अविश्वसनीय और विश्वासघाती है,
आज भी मुसलमान चाहे वह सरकारी उच्च पदों पर हों अथवा उसके बाहर हों घोर अराष्ट्रीय सम्मेलनों में खुले रूप से भाग लेते हैं। उनके भाषणों में भी खुली अवज्ञा और विद्रोह की झंकार रहती है[26]
र्इसाइयों को दूसरा बड़ा आंतरिक ख़तरा बताते हुए वे कहते हैं :
जहां तक ईसाइयों का सम्बन्ध है, ऊपरी तौर से देखने वाले को तो वे नितांत, निरुपद्रवी ही नहीं वरन मानवता के लिए प्रेम एंव सहानुभूति के मूर्तिमान स्वरूप प्रतीत होते हैं। उनकी गतिविधियां केवल अधार्मिक ही नहीं, राष्ट्र विरोधी भी हैं। इस प्रकार की भूमिका है हमारे देश में निवास करने वाले ईसाई सज्जनों की। वह यहां हमारे जीवन के धार्मिक एंव समाजिक तन्तुओं को ही नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील नहीं हैं, वरन विविध क्षेत्रों में और यदि सम्भव हो तो सम्पूर्ण देश में राजनीतिक सत्ता भी स्थापित करना चाहते हैं।[27]
नफ़रत से लबालब गुरु, गोलवलकर की इस पुस्तक में भारतीय संविधान पर कीचड़ उछाला गया है, समानता, न्याय की अवधारणा का तिरस्कार और राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की अवमानना की गर्इ है। भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कम से कम 50 ऐसे अपराध हैं जिनके लिए इस पुस्तक के लेखक और प्रकाशकों को आरोपित किया जा सकता है। बावजूद इसके, सभी भारतीय भाषाओं में यह पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है और धड़ल्ले से बिक रही है। इसकी गणना आरएसएस की सबसे ज़्यादा बिकने वाले पुस्तकों में होती है।
15. गौ-वध पर गोलवलकर का झूठ जिसने उन्मादित भीड़ द्वारा मुसलमानों की हत्या का रास्ता प्रशस्त किया।
2014 में मोदी बतौर प्रधानमंत्री सत्तारूढ़ हुए थे । इसके बाद आरएसएस से जुड़े गुंडों ने, गौ-वध के नाम पर उन्माद उत्पन्न करके भीड़ हत्या (lynching) और मुसलमानों की संपत्तियों को जलाने, लूटने का राष्ट्रव्यापी सिलसिला शुरू किया। इस तरह के सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं और यह क्रम जारी है। आरएसएस के एक प्रमुख कैडर,हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का एलान था :
इस देश मुसलमान रहें, मगर उन्हें यहां बीफ़ खाना छोड़ना होगा उनको। यहां मान्यता है गौ हमारी माता है।[28]
इस प्रकार 2014 में मोदी सरकार की शुरुआत के साथ भारत में मुसलमानों के रहने के लिए एक और शर्त जोड़ दी गर्इ। इन भीड़ हत्याओं के लिए वैचारिक आधार आरएसएस के गुरू गोलवलकर ने प्रदान किया। एक बेशर्म झूठ के जरिए उन्होंने घोषणा की कि गौ-हत्या :
का प्रारंभ हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं के आगमन के साथ हुआ। लोगों को ग़ुलामी के लिए तैयार करने के लिए उन्होंने सोचा कि हिंदुओं के आत्म सम्मान से जुड़ी हर चीज़ का निरादर करो...इसी सोच के चलते गो-वध भी शुरू किया गया।[29]
गोलवलकर का मतलब साफ़ था; भारत में गौ-वध की शुरुआत के लिए मुसलमान ज़िम्मेदार थे। नाज़ी वाद के प्रचारक पॉल जोसेफ़ गोएबल्स के इस भारतीय उत्तराधिकारी ने इस सच को दरकिनार कर दिया कि वैदिक कालिक स्रोतों में भी यह माना गया है कि भारत में वैदिक काल में गौमांस खाया जाता था और इसे ब्राह्मण भी खाते थे । स्वामी विवेकानंद को आरएसएस एक महान हिंदू दार्शनिक मानता है। अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित शेक्सपियर क्लब, पसाडेना (Shakespeare Club, Pasadena,) में आयोजित एक सभा (2 फ़रवरी, 1900) में ‘बौद्ध कालीन भारत’ विषय पर बोलते हुए स्वामी विवेकानंद ने बताया था :
आप अचंभित रह जाएंगे यदि प्राचीन वर्णनों के आधार पर मैं कहूं कि वह अच्छा हिंदू नहीं है, जो बीफ़ नहीं खाता है। महत्वपूर्ण अवसरों पर उसे आवश्यक रूप से बैल की बलि देना व उसे खाना चाहिए।[30]
एक अन्य अवसर पर उन्होंने इस तथ्य को फिर रेखांकित किया :
इसी भारत में कभी ऐसा भी समय था, जब कोई ब्राह्मण बिना गो-मांस खाये ब्राह्मण नहीं रह पाता था; तुम वेद पढ़ कर देखो कि किस तरह जब कोई संयासी या राजा मकान में आता था, तब सबसे पुष्ट बैल मारा जाता था। बाद में धीरे धीरे लोगों ने समझा कि हम कृषिजीवी जाति हैं, इसलिए अच्छे अच्छे बेलों का मारना हमारी जाति के विनाश का कारण है।[31]
इस तथ्य की पुष्टि स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के प्रायोजित एक अन्य शोध से भी होती है। वैदिक कालीन इतिहास और संस्कृति के अधिकारिक विद्वान सी. कुहन राजा के अनुसार :
वैदिक आर्य, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल थे, मछली, मांस, यहाँ तक कि बीफ़ भी खाते थे। एक सम्मानित अतिथि के आतिथ्य सत्कार में बीफ़ परोसा जाता था। हालाँकि वैदिक आर्य बीफ़ खाते थे लेकिन उसके लिए दुधारू गायों का वध नहीं किया जाता था। ऐसी गायों के लिए ‘अघन्नय’ (जिन्हें मारना नहीं है) का शब्द इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन एक अतिथि ‘गोघना’ (जिसके लिए गो-वध किया जाना है) माना जाता था। उस समय केवल बैल, बाँझ गाय और बछड़ों का वध किया जाता था।[32]
डॉ. भीम राम अंबेडकर की गणना भारतीय राजनीति, धर्म और संस्कृति से संबंधित विषयों पर महानतम शोधकर्ताओं में की जाती है। “क्या हिंदुओं ने कभी बीफ़ नहीं खाया?” शीर्षक से उनका एक गंभीर शोध आधारित लेख है।38अनेक वैदिक और हिंदू धर्म शास्त्रों का अध्ययन करने के बादडॉ. अंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे,
जब भी पढ़े-लिखे ब्राह्मण इस पर बहस करें कि हिंदुओं ने कभी बीफ़ नहीं खाया और वे तो गाय को पवित्र मानते हैं तथा उन्होंने सदा ही गो-वध का विरोध किया है तो उनकी बात को स्वीकार करना असंभव है।
अंबेडकर ने अपने निबंध का समापन इन शब्दों से किया:
इन सब सुबूतों के रहते किसी को संदेह नहीं हो सकता कि एक समय था जब हिंदू, चाहे वे ब्राह्मण हों या अन्य, न सिर्फ़ मांस-भक्षी थे बल्कि वे बीफ़ भी खाते थे।[33]
हिंदुत्ववादियों द्वारा भारत के कमज़ोर वर्गों के विरुद्ध की जा रही हिंसा आरएसएस के दोग़लेपन को ही उजागर करती है, जो उसकी रीति-नीति का अभिन्न अंग है। वास्तव में तो, किसी भी मुद्दे पर दो-तीन तरह की बातें करना आरएसएस के लिए बहुत कम ही माना जाएगा। हिंदुत्ववादी संगठन, ख़ास कर आरएसएस से जुड़े, साधारण इन्साफ़ पसंद भारतीयों की, बेधड़क हत्याएं कर रहे हैं, न केवल गो-वध के लिए बल्कि इन पशुओं के परिवहन करने पर भी। हद तो यह है कि उन दलितों को भी मौत के घाट उतरा जा रहा है, जो क़ानूनी तौर पर मुर्दा गायों की खाल उतर रहे थे। इसी के समानांतर आरएसएस/भाजपा की सत्ता वाले राज्य गोवा, मिज़ोराम, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर हैं, जहां गो-वध वैध है और बीफ़ वहां के मुख्य आहार में शामिल है। आरएसएस का तरीक़ा कुछ ऐसा है कि कुछ क्षेत्रों में गो-वध की बात तो दूर रही, गऊ के साथ पाए जाने पर आपको ‘नर्क’ भेजा जा सकता है और कुछ क्षेत्रों में इस से जुड़े लोग गो-वध कराते हुए राज कर रहे हैं। याद रहे हमारे देश में केरल जैसे राज्य भी है जहाँ बीफ़ ‘सेक्युलर’ खाना है!
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भीड़ हत्याओं (lynchings) में संघ की भूमिका से मुकरते हुए इनकार की मुद्रा ओढ़ ली। आरएसएस के मुख्यालय में आयोजित वार्षिक सभा में 8 अक्टूबर, 2019 को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा लिंचिंग एक “पश्चिमीकृत अवधारणा” है। इसका उपयोग भारत को बदनाम करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार,
भारतीय लोकाचार में लिंचिंग जैसा कोर्इ शब्द नहीं है। इसकी उत्पत्ति की कहानीएक पृथक धार्मिक पाठ से है। हम भारतीयों को भाईचारे पर भरोसा है। इस तरह के शब्दों को भारतीयों पर मत थोपिए।[34]
स्वाभाविक था कि आरएसएस सुप्रीमो इस विषय को हल्का करने के लिए कुछ इसी प्रकार का रुख़ अपनाते। उन्होंने दशहरे पर आरएसएस के मुख्यालय में अपने वार्षिक संबोधन (8 अक्टूबर, 2019) में घोषित किया,
आजकल इस प्रकार की सूचनाएं हैं कि हमारे समाज के कुछ सदस्यों ने दूसरे समुदाय के सदस्यों पर आक्रमण किया हैं और उन्हें सामाजिक हिंसा का शिकार बना रहे हैं। इस प्रकार हिंसात्मक घटनाएं एकतरफ़ा नहीं हुर्इ हैं। इस प्रकार की दोतरफ़ा घटनाओं की सूचनाएऔर परस्पर आरोप-प्रत्यारोपों के भी समाचार हैं। यह भी प्रकाश में आया है कि कुछ मामलों को सचेतन रूप से गढ़ा गया है और कुछ अन्य मामले हैं जिनमें वास्तविकता से हट कर विकृत रूप से प्रस्तुत किया गया है।[35]
ग़ौर तलब है कि कुछ वर्षों पहले जब भारत में बलात्कार की घटनाऐं काफ़ी अधिक बढ़ गर्इ थीं, भागवत ने घोषित किया था कि बलात्कार विदेशी हैं!
16. क्या ताजमहल का भी वही हश्र होगा जो अयोध्या में मस्ज़िद का हुआ था?
दुनिया के सबसे बड़े अजूबों में से भारत में ताजमहल ही है। प्रधानमंत्री मोदी के राज में हिंदुत्ववादी हत्यारे/विध्वंसक दस्ते का एक नया निशाना ताजमहल बन चुका है। इस स्मारक को मुग़ल बादशाह शाहजहां (1592-1666) ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में बनवाने का आदेश दिया था।
पश्चिमी यूपी के एक हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी, संगीत सोम 16 अक्टूबर, 2017 को मेरठ के निकट सिसौली गांव में 8वीं सदी के हिंदू राजा अनंगपाल सिंह तोमर की मूर्ति का उद्घाटन करने के बाद, मुसलमानों और इस्लाम पर कीचड़ उछालते हुए एक बार फिर बड़े जोश में नज़र आए। इस बार उन्होंने गाय, लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दों के बाद, अपने भंडारगृह से निकाल कर एक और विषय छेड़ा। हिंदुत्व के ध्रुवीकरण के एजेंडे के तहत उन्होंने यह नया विषय चुना है ताजमहल! अब वे इसे लेकर आक्रामक हैं।
प्रेस रिपोर्टों के अनुसार सोम ने एकत्रित समूह को संबोधित करते हुए अपने भाषण में कहा :
कई लोगों को यह देखकर पीड़ा हुई कि ताजमहल को ऐतिहासिक स्थानों की सूची से हटा दिया गया है,क्या है इतिहास, किस स्थान का इतिहास है, किसका इतिहास है। जिस व्यक्ति (शाहजहां) ने ताजमहल बनाया, उसने अपने पिता को क़ैद किया था, उसने उत्तर प्रदेश और भारत के हिंदुओं को निशाना बनाया। अगर ऐ से लोग अभी भी इतिहास में जगह पाते हैं, तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं गारंटी देता हूं कि इस इतिहास को बदल दिया जाएगा।[36]
सोम ने ताजमहल के बहाने जहर उगलना जारी रखते हुए फ़रमाया :
पिछले कुछ वर्षों में, भारत और उत्तर प्रदेश में इतिहास को विकृत करने का प्रयास किया गया है। आज भारत और यूपी की सरकारें उस इतिहास को दुरुस्त कर रही हैं।पाठ्य पुस्तकों मेंराम, कृष्ण से लेकर, महाराणा प्रताप, शिवाजी राव तक के इतिहास को सम्मिलित किया जा रहा है। हमारी किताबों में इतिहास का दागदार हिस्सा, जैसे कि अकबर, औरंगज़ेब, बाबर सरकार उन्हें हटाने का काम कर रही है।[37]
इतिहास के प्रति कट्टर हिन्दुत्वादी सोम का हास्यास्प्रद नज़रिया
भारतीय इतिहास के बारे में हिंदुत्ववादियों का यह प्रवचन अत्यंत घटिया और हास्यास्प्रद है। जहां तक तथ्यों का सवाल है, आरएसएस वालों को उससे कोर्इ लेना-देना तो होता नहीं है। वे अपने में ही मस्त रहते हैं। आरएसएस के बौद्धिकप्रशिक्षण शविरों में किस प्रकार के बुद्घजीवी पैदा किए जाते हैं, इसकी एक झलक सोम के उक्त भाषण में देखी जा सकती है। शाहजहां बन गया औरंगजेब! शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में ताजमहल बनवाया था, बता दिया गया कि उसने अपने पिता को जेल में डलवा दिया था। जबकि, तथ्य यह है कि क़ैद में तो ख़ुद शाहजहां था। शाहजहां को उसके पुत्र औरंगज़ेब द्वारा सत्ता संभालने के बाद उसकी मृत्यु तक आगरा के लाल किले में क़ैद में रखा था। लेकिन जहां तक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मक़सद है, कोर्इ भ्रम नहीं था।
सोम आरएसएस का प्रिय कट्टर हिंदुत्ववादी है। वह 2013 के मुजफ्फ़रनगर दंगों में भड़काऊ बयान देने के लिए आरोपी है। इन दंगो में कम से कम 60 लोग के मारे जाने और 50,000 लोगों के विस्थापित होना बताया जाता है। मुजफ्फ़ रनगर दंगों पर जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट ने सोम का नाम दंगों के लिए ज़िम्मेदार लोगों में है। पिछले यूपी विधानसभा चुनावों में सोम और उसके साथियों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाली एक फिल्म को दिखाने और सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने के आरोप हैं। आरएसए-भाजपा के इस नेता पर 2015 में दादरी के बिसडा गांव में मोहम्मद इखलाक की हत्या और सांप्रदायिक तनाव भड़काने से संबंधित मामलों में भी आरोप रहा है।
हिंदुत्व की राजनीति के लिए सोम की इस प्रकार की सेवाओं के लिए हीहिंदू संगठनों द्वारा उसे ‘हिंदू हृदय सम्राट’और ‘संघर्ष वीर महाठाकुर’जैसे ख़िताबों से नवाज़ा गया। हिंदुत्ववादी खेमे में सोम की शोहरत का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि आरएसएस-भाजपा सरकार ने उसे सलाख़ों के पीछे पहुंचाने के बजाय जेड श्रेणी (भारत में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बाद तीसरे नंबर पर दी जाने वाली सुरक्षा) की सुरक्षा प्रदान की गर्इ थी।[38]
यह सच है कि भाजपा नेताओं के एक वर्ग ने आधे-अधूरे मन से सोम के द्वारा व्यक्त मत से अपने मतभेद ज़ाहिर किए।लेकिन यहां ध्यान रखा गया है कि उनकी इस प्रकार की प्रतिक्रिया से इस नफ़रत फैलाने वाले व्यक्ति की आलोचना न हो। प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं हो। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन पर्यटन मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने स्पष्ट किया, ताजमहल हमारी विरासत का हिस्सा रहा है। लेकिन जब उनसे सीधे सवाल किया गया तो ताजमहल के ख़िलाफ़ नफ़रत अभियान के लिए सोम की निंदा करने के बजाय उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा :
ठीक है, हर व्यक्ति अपनी राय बनाने के लिए स्वतंत्र है लेकिन जहां तक सरकार का सवाल है ताज हमारी प्राथमिकता सूची में बहुत ऊपर है।
इसमें कोई शक नहीं है कि सोम का निंदा अभियान न तो कोर्इ अपवाद था और न ही गफ़लत। सोम ने इस स्मारक के बारे में आरएसएस-भाजपा के सांप्रदायिकता पर आधारित नज़रिए को ही ज़ा हिर किया है। जून 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निस्संकोच कहा था “रामायण और गीता भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं न कि ताजमहल।” उन्होंने जोर देकर कहा कि हाथी-दांत जैसा दिखने वाला-सफेद संगमरमर का मक़ बरा “भारतीय संस्कृति” का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।
ताजमहल को मुद्दा बनाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरएसएस-भाजपा के मंसूबे को एक और हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी विनय कटियार के बयान से समझा जा सकता है। कटियार आरएसएस-भाजपा के वरिष्ठ नेता, बजरंग दल के संस्थापक, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा राज्यसभा में भाजपा सांसद रह चुके हैं। ताजमहल को लेकर सोम के विष वमन के दो दिन बाद कटियार ने कहा मुग़ल बादशाह शाहजहां ने भगवान शिव के मंदिर तेजोमहल को तोड़कर ताजमहल का निर्माण करवाया था।[39] ग़ौर तलब है, 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के सूत्रधार के रूप में विनय कटियार आरोपी थे। सीबीआर्इ अदालत से दोषमुक्त किए जाने के बाद एनडीटीवी को अपने बयान में उन्होंने कहा है अब मथुरा और काशी की बारी है। सभी साधु संतों के साथ मिलकर तय करेंगे कि काशी और मथुरा के आंदोलन को कैसे आगे लेकर जाना है।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आरएसएस के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता जी वी एल राव का बयान सोम के बयान से ज़्यादा अलग नहीं था, हालांकि उन्होंने सोम से मतभेद ज़ा हिर किया लेकिन, उन्होंने भी ताजमहल को सोम की ही भांति,हत्यारे और बर्बर इस्लामी शासन की विरासत बताते हुए कहा है :
एक दल के रूप में, स्मारक विशेष को लेकर हम नहीं सोचते हैं। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि इस्लामिक शासन काल—लगभग 800 साल— चरम शोषण,उन्मत बर्बरता और एक-दूसरे की आस्थाओं और विश्वास के प्रति अभूतपूर्व असहिष्णुता का दौर था। कोई यदि इन तथ्यों को ढकने का प्रयत्न करता है,वास्तविक इतिहास को विकृत करता है। वैश्विक स्तर के इतिहासकारों का द्वारा पर्याप्त दस्तावेज़ों सहित यह प्रमाणित है कि दुनिया में जहां भी मुस्लिम आक्रमण और उनका शासन रहा है वह सर्वाधिक दमनकारी और प्रतिगामी था।[40]
ताजमहल मुग़ल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। यह दुनिया में भारतीय कला और संस्कृति का अक्षुण प्रतीक है। आरएसएस को इसलिए इससे इतनी नफ़रत है क्योंकि वह समझता है कि प्रेम का यह स्मारक संघ द्वारा प्रतिपादित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक विचारधारा के लिए सजीव चुनौती है। यही कारण है कि सत्ता के गलियारों के उच्चतम ठिकानों पर मौजूद ये तत्व इसे लेकर नफ़रत का जहर फैलाते रहते हैं। सितंबर 2020 के तीसरे सप्ताह के अंत में, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर कहा कि यह स्मारक भारत का प्रतीक नहीं हो सकता है और यह कि “हमारे नायक मुग़ल कैसे हो सकते हैं?”[41]
ताजमहल के अस्तित्व के लिए तीन गंभीर खतरे
ताजमहल की सुरक्षा और अस्तित्व के लिए ख़तरा वास्तविक है। आरएसएस के प्रति निष्ठा रखने वाले शासक कोर्इ भी आश्चासन दें, भरोसा नहीं किया जा सकता। भारत यह नहीं भूल पाया है कि कैसे हिंदुत्ववादियों, विशेष रूप से आरएसएस से जुड़े कट्टरपंथियों ने बाबरी मस्जिद मामले में सर्वोच्च न्यायालय,संसद और उस समय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को आश्वासन दिया था कि मस्जिद को क्षति नहीं पहुंचायी जाएगी,उसके बावजूद, छल किया और मस्जिद को धराशायी कर दिया गया। तात्कालिक रूप से ताजमहल के लिए तीनतरह से ख़तरा मंडरा रहा है।
1. जिस तरह से 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में और 2006-7 में कंधमाल में चर्चों और पादरियों की शिक्षण संस्थाओं (seminaries) को राष्ट्रविरोधी बता करके उन्माद उत्पन्न किया, भीड़ को उकसाकर उन्हें ध्वस्त किया गया उसी तरह से ताजमहल को इस्लामिक दमनकारी शासन के प्रतीक बताकर उन्मादित भीड़ जुटा करके क्षतिग्रस्त/नष्ट कराया जा सकता है। ग़ौर तलब है कि कई ’हिंदू इतिहासकारों/बुद्धिजीवियों’का दावा है कि ताजमहल एक मंदिर था।
2. कुछ इस्लामी समूहों के अनुसार ताजमहल जैसे मक़ बरे की इजाजत इस्लाम में नहीं है। इसे आधार बनाकर छद्म इस्लामवादी समूहों का इस्तेमाल करके ताजमहल को क्षतिग्रस्त/नष्ट कराया जा सकता है। स्मरण रहे आरएसएस अपने मक़सद को हासिल करने के लिए षड्यंत्रों का सहारा लेने में माहिर है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी भारत के पहले गृह-मंत्री सरदार पटेल को आरएसएस की कार्यप्रणाली के इस पहलू के प्रति सचेत किया था। इस विषय पर इस पुस्तक में आगे चर्चा की गर्इ है।
3. भले ही ताजमहल का विध्वंस न किया जाए उसकी सुंदरता और भव्यता, जिसके लिए यह प्रसिद्ध है को स्थायी क्षति पहुंचार्इ जा सकती है। इस प्रकार के षड्यंत्र के लिए ताजमहल की सफ़ाई के लिए उप-मानक, घटिया और हानिकारक रसायनों का उपयोग करके इसे क्षतिग्रस्त किया जा सकता है। भारत की इस ‘इस्लामी’ विरासत के रख-रखाव और देखभाल करने के लिए हिंदुत्ववादी विशेषज्ञों/सलाहकारों के माध्यम से यह मुमकिन हो सकता है।
इस प्रकार के किसी प्रयत्न को रोकने और उसका प्रतिकार करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय को स्वतः संज्ञान लेकर हस्तक्षेप करना चाहिए था, क्योंकि केंद्रीय तथा राज्य स्तर पर भी योगी आदित्यनाथ, सोम, जीएल राव और विनय कटियार जैसे लोग हैं जो लगातार ताजमहल को लेकर दुष्प्रचार करते रहे हैं। लेकिन न्यायालय भी इस पर चुप्पी साधे हुए है। इसलिए राष्ट्रसंघ, विशेशकर यूनेस्को को ताजमहल को बचाने के लिए पहल करनी चाहिए।
17. आरएसएस के अनुसार सिख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म स्वतंत्र धर्म नहीं हैं!
आरएसएस इस्लाम और ईसाई धर्म के अनुयायियों को प्रवासी या विदेशी मानता है। आरएसएस की सदा यही कोशिश रही है कि इन दोनों को विदेशी धर्म बताकर देश से इनका सफ़ा या कर दिया जाए। सिख धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म जैसे अन्य भारतीय धर्मों के प्रति भी आरएसएस में कोई सम्मान भाव नहीं है। इन्हें स्वतंत्र धर्म नहीं बल्कि हिंदू धर्म का हिस्सा माना जाता है। गुरु गोलवलकर ने घोषणा की थी कि, “बौद्ध, जैन, सिख सभी एक व्यापक शब्द ‘हिंदू’ में शामिल हैं।”[42] गोलवलकर ने हिदुत्व के शिखर-पुरुष सावरकर के पदचिह्नों पर चलते हुए सिख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म को स्वतंत्र धर्म का दर्जा देने से इंकार किया। सावरकर के अनुसार
वैदिक धर्म, सनातन धर्म, जैन, बौद्घ, लिंगायत, सिख,आर्य समाज, ब्रह्मसमाज, देवसमाज, प्रार्थना समाज, और इस प्रकार के अन्य भारत में जन्मे धर्म, सभी हिंदू हैं और सभी हिंदूमत के अंग हैं। मतलब कि ये सब हिंदू हैं।[43]
18. 1984 के सिख जनसंहार को आरएसएस के प्रमुख चिंतक/नेता नाना देशमुख ने जायज़ बताया।
आरएसएस भारत में अल्पसंख्यकों का दो श्रेणियों में विभाजित करने से कभी नहीं थकता है। प्रथम श्रेणी में है जैन, बौद्ध तथा सिख जो भारत में ही जनमें धर्मों अर्थात ‘देसी’ धर्मों का अनुसरण करते हैं। दूसरी श्रेणी में है मुसलमान एवं ईसाई जो ‘विदेषी’ धर्मों के अनुयायी हैं। उसका दावा है कि वास्तविक समस्या दूसरी श्रेणी के साथ है जिनका हिन्दूकरण करने की ज़रुरत है जबकि प्रथम श्रेणी को अल्पसंख्यकों के लेकर कोई समस्या नहीं है। यह प्रस्थापना कितना कपटपूर्ण है, इसका पता इस बात से चलता है कि आरएसएस इन ‘देसी’ अल्पसंख्यक धर्मों को स्वतंत्र धर्म का दर्जा ही प्रदान नहीं करता है। उन्हें हिन्दू धर्म का ही एक हिस्सा घोशित किया जाता है। आरएसएस के ऐसे प्रभुत्ववादी मंसूबों के ख़िलाफ़ संबद्ध अल्पसंख्यकों द्वारा कड़ा प्रतिवाद किया जाता रहा है। आरएसएस देश के इन धर्मों का कितना सम्मान एवं आदर करता है, इसका पता 1984 में सिखों के क़त्ले-आम के प्रति उसके दृष्टिकोण से भी चलता है।
इस संबंध में अक्तूबर-नवंबर 1984 में सिखों के क़त्ले-आम के संबंध में एक स्तब्धकारी दस्तावेज़ का पूरा पाठ प्रस्तुत किया जा रहा है जिसे आरएसएस के सुप्रसिद्ध नेता नाना देशमुख ने लिखा और प्रसारित किया था।[44] 31 अक्तूबर 1984 को अपने ही दो सुरक्षा गार्डों द्वारा जो सिख थे, श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद भारत भर में हज़ारों निर्दोष सिख पुरुषों, महिलाओं एवं बच्चों को ज़िन्दा जला दिया गया, उनकी बर्बर हत्याएं की गईं और अपंग बना दिया गया। सिखों के हज़ारों धार्मिक स्थलों और अनगिनत वाणिज्यिक एवं आवासीय संपत्तियों को नष्ट कर दिया गया। आमतौर पर यह माना जाता रहा है कि इस नरसंहार के पीछे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हाथ था, यह सही हो सकता है, लेकिन दूसरी फ़ासिस्ट एवं सांप्रदायिक ताक़तों भी थीं, जिन्होंने इस नरसंहार में सक्रिय हिस्सा लिया, जिनकी भूमिका की कभी भी जांच नहीं की गयी। यह दस्तावेज़ उन सभी अपराधियों पर से पर्दा उठाने में मदद कर सकता है जिन्होंने निर्दोष सिखों के साथ खून की होली खेली जिनका इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ भी लेना-देना नहीं था। यह दस्तावेज़ इस बात पर रोशनी डाल सकता है कि इतने कैडर आख़िर आये कहां से जिन्होंने पूरी तैयारी से सिखों के क़त्ले-आम को अंजाम दिया। जो लोग 1984 के क़त्ले-आम तथा अंगभंग के प्रत्यक्षदर्षी रहे हैं, वे उन हत्यारे, लुटेरे गिरोहों की तेज़ी एवं सैनिक फूर्ति एवं सटीकपन से भौंचक हो ग़ ये थे जिन्होंने निर्दोष सिखों को मौत के घाट उतारा (इस प्रकार की तैयारी बाद में बाबरी मस्जिद के ध्वंस, डा. ग्राहम स्टेन्स एवं दो पुत्रों को ज़िन्दा जला देने और हाल ही में गुजरात में मुसलमानों के क़त्ले-आम के दौरान देखी गयी)। यह सब कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की क्षमता के बाहर था। नाना का दस्तावेज़ उन प्रशिक्षित कैडरों के स्रोत की छानबीन में षोधकर्मियों को मदद करेगा जिन्होंने इस नरसंहार में कांग्रेसी गुंडों की मदद की।
यह दस्तावेज़ भारत के सभी अल्पसंख्यकों के प्रति आरएसएस के असली पतित एवं फ़ासिस्ट दृष्टिकोण को दर्शाता है। आरएसएस यह दलील देता रहा है कि वे मुसलमानों एवं ईसाइयों के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि वे ‘विदेषी’ धर्मों के अनुयायी हैं। यहां हम पाते हैं कि वे सिखों के नरसंहार को भी उचित ठहराते हैं जो स्वयं उनकी अपनी श्रेणीबद्धता की दृश्टि से भी अपने ही देश के एक धर्म के अनुयायी हैं।
आरएसएस बार-बार अपने को, हिन्दू-सिख एकता में दृढ़ विष्वास करने वाले के रूप में पेश करता है। लेकिन इस दस्तावेज़ में हम देखेंगे कि आरएसएस तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की तरह यह विष्वास करता था कि निर्दोष सिखों का क़त्ले-आम उचित था। इस दस्तावेज़ में देशमुख ने बड़ी धूर्तता से सिख समुदाय के नरसंहार को उचित ठहराने का प्रयास किया है जैसा कि हम नीचे देखेंगेः
a. सिखों का नरसंहार किसी विशेष ग्रुप या समाज-विरोधी तत्वों का काम नहीं था बल्कि वह आम लोगों के क्रोध एवं रोश की सच्ची भावना का परिणाम था।
b. देशमुख श्रीमती इंदिरा गांधी के दो सुरक्षा कर्मियों जो सिख थे, की कार्रवाई को पूरे सिख समुदाय से अलग नहीं करते हैं। उनके दस्तावेज़ से यह बात उभरकर सामने आती है कि इंदिरा गांधी के हत्यारे अपने समुदाय के किसी निर्देष के तहत काम कर रहे थे। इसलिए सिखों पर हमला उचित था।
c. सिखों ने स्वयं इन हमलों को न्यौता दिया, इस तरह सिखों के नरसंहार को उचित ठहराने के कांग्रेसी सिद्धांत को आगे बढ़ाया।
d. उन्होंने ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ को महिमामंडित किया और किसी तरह के उसके विरोध को राष्ट्र-विरोधी बताया है। जब हज़ारों की संख्या में सिख मारे जा रहे थे तो वे सिख उग्रवाद के बारे में देश को चेतावनी दे रहे थे, इस तरह इन हत्याओं का सैद्धांतिक रूप से बचाव करते हैं।
e. उनके अनुसार समग्र रूप से यह सिख समुदाय है जो पंजाब में हिंसा के लिए ज़िम्मेवार हैं।
f. सिखों को आत्म-रक्षा में कुछ भी नहीं करना चाहिए बल्कि हत्यारी भीड़ के ख़िलाफ़ धैर्य एवं सहिश्णुता दिखानी चाहिए।
g. हत्यारे नहीं, बल्कि सिख बुद्धिजीवी सिखों के क़त्ले-आम के लिए ज़िम्मेवार हैं। उन्होंने सिखों को खाड़कू समुदाय बना दिया है और हिन्दू मूल से अलग कर दिया है, इस तरह राष्ट्र वादी भारतीयों द्वारा हमले को न्यौता दिया है। यहां फिर वे सभी सिखों को एक ही गिरोह का हिस्सा मानते हैं और हमले को राष्ट्र वादी हिन्दुओं की एक प्रतिक्रिया।
h. वे श्रीमती इन्दिरा गांधी को एकमात्र ऐसा नेता मानते हैं जो देश को एकताबद्ध रख सकीं और उनके अनुसार एक ऐसी महान नेता की हत्या पर ऐसे क़त्ले-आम को टाला नहीं जा सकता था।
i. यह दुखद है कि सिखों के क़त्ले-आम की तुलनागांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर हुए हमले से की जाती है और हम यह पाते हैं कि नाना सिखों को चुपचाप सब कुछ सहने की सलाह देते हैं। हर कोई जानता है कि गांधीजी की हत्या आरएसएस की प्रेरणा से हुई जबकि आम सिखों को श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ भी लेना-देना नहीं था।
j. केन्द्र में उस समय की कांग्रेसी सरकार से अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा को नियंत्रित करने के उपायों की मांग करते हुए एक भी वाक्य नहीं लिखा गया है। ध्यान दें, देशमुख ने 8 नवंबर 1984 को यह दस्तावेज़ वितरित किया और 31 अक्तूबर से उपर्युक्त तारीख तक मासूम सिखों को हत्यारे गिरोहों का सामना करने के लिए अकेले छोड़ दिया गया था। वास्तव में 5 से 10 नवंबर के बीच वह अवधि है जब सिखों की अधिकतम हत्याएं हुईं। नाना के इस दस्तावेज़ में इस सबके लिए कोई भी चिन्ता नहीं झलकती।[45]
19. नाना देशमुख को मोदी सरकार ने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान “भारत रत्न” से नवाज़ा।
1984 के सिख जनसंहार के शहीदों और इसमें बचे लोगों के साथ हुआ अन्याय गोया कि काफी नहीं था, 2019 के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सत्तारूढ़ आरएसएस-भाजपा ने नाना देशमुख को भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार भारत रत्न प्रदान करदिया। भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने देशमुख की तारीफ़ करते हुए कहा,
वे विनय, करुणा और दीन-हीन की सेवा के प्रतीक हैं। वे सच्चे अर्थ में भारत रत्न हैं।51
आरएसएस चाहता है कि 1984 के सिख जनसंहार को देश भूल जाए। आरएसएस से संबद्ध ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ की ओर से वरिष्ठ आरएसएस विचारक दीना नाथ बत्रा ने मांग की है, पाठ्य पुस्तकों में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा के सभी संदर्भ हटा दिए जाने चाहिए। इनमें एक संदर्भ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 1984 में हुर्इ हिंसा के लिए क्षमायाचना से संबंधित है, जिसे इस घटना के बारे में ज़िक्र के साथ पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित किया गया था। मनमोहन सिंह ने 12 अगस्त 2005 को संसद में क्षमा याचना करते हुए कहा था :
मुझे सिख समुदाय से माफी मांगने में कोई संकोच नहीं है। मैं न केवल सिख समुदाय से, बल्कि पूरे भारतीय राष्ट्र से माफी मांगता हूं क्योंकि 1984 में जो कुछ हुआ वह हमारे संविधान में निहित राष्ट्रवाद की अवधारणा की विरुद्घ था।52
यह कितना शर्मनाक है कि इस तरह की सामान्य सी माफी भी आरएसएस को मंजूर नहीं है।
20. अंतर्राष्ट्रीय फ़ासीवादी संगठनों के साथ आरएसएस के संपर्क।
न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट
भारत और उसके पड़ोस में एक नया आतंकवादी नेटवर्क तेजी से विकसित हो रहा है। इसमें आरएसएस के साथ म्यांमार और श्रीलंका के दो उग्र राष्ट्रवादी बौद्ध संगठन सम्मलित हैं। इनके निशाने पर इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक, मुस्लिम और ईसाई हैं। अभी तक दुनिया इसकी गंभीरता के प्रति सचेत नहीं है। ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यूयॉर्क टाइम्स’ (16 अक्टूबर, 2014) के एक संपादकीय ने इस ओ र सचेत किया है। इस संपादकीय का शीर्षक था“मुसलमानों के ख़िलाफ़ घातक गठजोड़’। संपादकीय में बताया गया है :
दलाई लामा ने जुलाई [2014] में अपने 79 वें जन्मदिन पर,म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध चरमपंथी समूहों से अपील की है के वेमुसलमान अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ उत्तेजनात्मक हमलों की सरपरस्ती करना बंद करें। इन हमलों में सैकड़ों की जान जा चुकी है। बौद्ध धर्म करुणा का दर्शन है। उसके अनुरूप इस अपील को मानने की बजाए इन आतंकवादी समूहों के नेताओं ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक गठबंधन बनाने की घोषणा की है।
श्रीलंका के कट्टरपंथी बौद्ध संगठन ‘बोडू बाला सेना'के नेता गलगोडा अथथ ज्ञानसारा थेरो ने पिछले महीने कोलम्बो में आयोजित एक सम्मेलन में एलान किया, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ बनाने का वक्त आ गया है। इस सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि म्यांमार के बौद्ध कट्टरपंथी अशीन विराथु उपस्थित थे। अमेरिका से प्रकाशित ‘टाइम’पत्रिका के 1 जुलाई के अंक में मुख्य पृष्ठ पर विराथु की बड़ी तस्वीर छपी थी। जिसका शीर्षक “बौद्घ आतंक का चेहरा”था। श्रीलंका में मुस्लिम और र्इसार्इ नागरिकों की बड़ी तादाद है। मुस्लिम विरोधी हिंसा के प्रवक्ता के तौर पर श्रीलंका में विराथु के आगमन का ज़बरदस्त विरोध हुआ था। उसे वीसा प्रदान नहीं किए जाने की मांग की जा रही थी। श्रीलंका के प्रधान मंत्री महिंद्रा राजपक्षे सरकार ने श्रीलंका के मुसलमानों और र्इसार्इ नागरिकों की इस मांग को नज़ रअंदाज कर दिया। विराथु को वीज़ा प्रदान करने से कई मुसलमानों की आशंकाओं को बल मिल सकता है कि सरकार और बोडू बाला सेना के बीच गठजोड़ पनप रहा है।
“इसके एक हफ्ते पहले, विराथु ने दावा किया था कि भारत के दक्षिणपंथी हिंदू संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक के साथ मे दक्षिण एशिया में ‘हिंदू-बौद्ध शांति क्षेत्र’विकसित करने के विषय पर उच्च स्तरीय चर्चा हुर्इ है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक के प्रवक्ता, राम माधव ने इससे तुरंत इनकार किया कि इस तरह की कोई चर्चा हुई है। राम माधव भारतीय जनता पार्टी के महासचिव हैं, लेकिन उन्होंने अपने फेसबुक और ट्विटर अकाउंट पर ‘बोडू बाला सेना’और म्यांमार में वीराथु के आतंकी गुट ‘969’ के प्रति सहानुभूति व्यक्त की है।”
अखबार ने संपादकीय का अंत म्यांमार, श्रीलंका, और भारत के शासकों से निम्नलिखित अपील के साथ किया :
यह श्रीलंका में राजपक्षे की सरकार, म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सीन और भारत में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनके राजनीतिक सहयोगियों के लिए इस प्रकार के किसी गठजोड़ से जुड़ना भारी भूल होगी। बल्कि ऐ से क्षेत्र में, जहां अक्सर संकीर्ण सांप्रदायिक हिंसा भड़कती रहती है, इस्लामोफोबिया से ग्रसित इस प्रकार के गुटों के साथ नज़र आना, उनका समर्थन या उन्हें बर्दाश्त करते दिखना भी मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं होगा। इससे चाहिए यह कि साम्प्रदायिक आतंकवाद इस इस क्षेत्र में कदम बढ़ाए इससे पहले इस प्रकार के उन्मत्त गठबंधन की निंदा करनी चाहिए।[46]
नार्वे के नव-नाज़ी हत्यारे ब्रेविक के साथ आरएसएस के संपर्क
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दक्षिणपंथी आतंकवाद से आरएसएस के रिश्तों की कड़ी में दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के सफ़ाए के लिए अति-रूढ़िवादी बौद्ध संगठन के साथ घातक गठजोड़ के बारे में ज्ञानसार का रहस्योद्घाटन इस तरह का पहला मामला नहीं है। नॉर्वे के नव-नाज़ी हत्यारे, एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक ने भी भारत केहिंदू राष्ट्रवादियों[47] का गौरवरवगान करते हुए एलान किया है कि दुनिया की जनतांत्रिक व्यवस्थाओं के तख़्ता पलटने के नए वैश्विक संघर्ष की ज़रुरत है और इसमें “हिंदू राष्ट्रवादी” आंदोलन प्रमुख सहयोगी है। नॉर्वे में बड़ी संख्या में लोगों का जनसंहार करने से ठीक पहले ब्रेविक ने 1,518 पन्नों का एक “घोषणा-पत्र” जारी किया था, जिसमें से 102 पेज भारत के हिंदुत्ववादी आंदोलन की तारीफ़ से भरे थे। घोषणा पत्र में “सनातन धर्म आंदोलन” और भारत के “हिंदू राष्ट्रवादियों” का समर्थन दिया गया।
इस घोषणापत्र में यूरोप के नव-नाज़ी आंदोलनों और भारत के “हिंदू राष्ट्रवादी” संगठनों के बीच सहयोग की योजना का हवाला है। कहा गया है “हमारे लक्ष्य कमोबेश समान हैं।” जरूरी है कि दोनों “एक दूसरे से सीखें और जितना संभव हो उतना सहयोग करें”। इस घोषणापत्र में हिंदुत्व की राजनीति के संदर्भ में आरएसएस, भाजपा (आरएसएस की राजनीतिक शाखा), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद(आरएसएस का छात्रसंघ) और विश्व हिंदू परिषद (आरएसएस द्वारा निर्मित संगठन) का नामोल्लेख था।[48]
महत्वपूर्ण बात यह है कि घोषणापत्र में “सभी पश्चिमी यूरोपीय बहु-सांस्कृतिक सरकारों को उखाड़ फेंकने” के एक बड़े अभियान के रूप में “भारत से सभी मुसलमानों को गृह युद्ध के जरिए भारत से खदेड़ बाहर करने के लिए” हिंदू राष्ट्रवादियों का सैन्य समर्थन का वायदा किया गया था।
इन तथ्यों की रोशनी में यह माना जा सकता है कि आरएसएस धीरे-धीरे मुसलमानों, ईसाइयों और उदार तत्वों के ख़िलाफ़ नफ़रत की अपनी राजनीति को फैलाने और निष्पादित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क बनाने की दिशा में सक्रिय है। अल्पसंख्यकों की सफ़ार्इ के लिए आरएसएस का लक्ष्य इस क्षेत्र और दुनिया के सामने गंभीर दिशा में अग्रसर है। वे अपने इस मक़ सद का अंतर्राष्ट्रीयकरण कर रहे हैं।
21. आरएसएस ने राष्ट्रपिता गांधी तक को नहीं बख़्शा।
हिंदू महासभा और आरएसएस दोनों राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार हैं। सरदार वल्ल्भभार्इ पटेल द्वारा हिंदू महासभा के प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 18 जुलार्इ 1948 को लिखे गए पत्र से इसकी पुष्टि होती है। सरदार पटेल ने इस पत्र में लिखा था :
जहां तक आरएसएस और हिंदू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए। लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं का, ख़ासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर काण्ड संभव हो सका। मेरे दिमाग़ में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी भाग साज़िश में शामिल था। आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए ख़तरा थीं। हमें मिली रिपोर्टें बताती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद वे गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं। दरअसल, समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली अधिक उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही है।[49]
22. गांधीजी की हत्या पर उत्सव : बताया हिंदू-राष्ट्र की बलिवेदी पर दानव वध।
मोदी सरकार के 2014 में सत्ता पर क़ाबिज़ होने के बाद आरसएस-भाजपा के नेताओं द्वारा गांधीजी के हत्यारों को स्वतंत्रता सेनानी की मान्यता दिए जाने की मांग की जाने लगी। गांधी हत्या में मुख्य हत्यारे नाथूराम विनायक गोड्से की प्रतिमा के साथ मंदिर बनाए जा रहे हैं। हिंदुत्ववादी संगठन गांधीजी की हत्या को हिंदूराष्ट्र की बलिवेदी पर दानव वध बताकर प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं। ग़ौर तलब है कि नाथूराम गोड्से और अन्य, जिन्होंने गांधीजी की हत्या का षड़यंत्र रचा था, के बारे में साक्षी महाराज[50], प्रज्ञा ठाकुर, उषा ठाकुर ने दावा किया है, वे “हिंदू राष्ट्रवादी” थे। संघ से संबंधित ये और ऐसे लोग गोड्से को महानतम देशभक्त घोषित कर रहे हैं।[51]
23. गोड्से की पिस्तौल की नीलामी चाहता है भाजपा आर्इटी-प्रकोष्ठ।
भाजपा आर्इटी-प्रकोष्ठ इंदौर के प्रभारी विक्कि मित्तल ने मांग की है कि यह तय करने के लिए कि गांधी और गोड्से में से कौन अधिक लोकप्रिय है “गोड्से की पिस्तौल की नीलामी की जाए।” पता चल जाएगा कि के गोड्से आतंकवादी था या देशभक्त? वे मुतमइन हैं के गांधी का हत्यारा जीतेगा।[52]
आप यदि समझते हैं कि यह सब आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की जानकारी के बिना हो रहा है, तो भारी भूल में है। आरएसएस से संबद्ध एक प्रमुख हिंदूत्ववादी संगठन ‘हिंदू जनजागृति समिति’ है। भारत में ‘हिंदू राष्ट्र की स्थापना’ के लिए यह नियमित रूप से राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करती है। इससे सम्बंधित ‘सनातन संस्था’ के सदस्य अनेक आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं। मुस्लमान बहुल क्षेत्रों और उन के धार्मिक स्थलों में बम विस्फोट की घटनाओं के अलावा गोविंद पानसरे, नारायण दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों की हत्या के आरोपों में भी यह जांच के दायरे में है। ‘हिंदू जनजागृति मंच’ का गोवा सम्मेलन (जून 6-10, 2013) गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्रभाई मोदी के शुभकामना संदेश के साथ शुरू हुआ था। इसमें भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने की अपनी परियोजना की सफलता की कामना की गर्इ थी।[53]
इंसानियत की तमाम हदें पर करते हुए, इसी मंच से जून 10 को हिंदुत्व वादी संगठनों, विशेष कर आरएसएस के क़रीबी लेखक केवी सीतारमैया का भाषण हुवा। उन्हों ने आरम्भ में ही घोषणा की कि, “गाँधी भयानक दुष्कर्मी और सर्वाधिक पापी था”। उन्हों ने अपने भाषण का अंत, गाँधीजी के क़ातिल गोडसे का महामण्डन करते हुए, इन शर्मनाक शब्दों से किया:
जैसा की भगवन श्री कृष्ण ने कहा है- ‘दुष्टों के विनाश के लिए, अच्छों की रक्षा के लिए और धर्म की स्थापना के लिए, में हर युग में पैदा होता हूँ’ 30 जनवरी की शाम, श्री राम, नाथूराम गोडसे के रूप में आए और गाँधी का जीवन समाप्त कर दिया।[54]
इस भाषण की रिपट हिंदू जनजागृति समिति की वेबसाइट से हटा दी गर्इ है[55], लेकिन यह अमेरिका अधारित एक वेबसाइट ‘हिंदू जागृति के लिए एक मंच’ पर उपलब्ध है।[56]
24. आरएसएस उत्तर भारत के सवर्ण हिंदूओं का वर्चस्ववादी संगठन।
आगर कुछ लोग यह सोचते हैं कि आरएसएस केवल मुसलमानों और ईसाईयों का देश से सफ़ाया चाहता है तो वे इस हिन्दुत्वादी संगठन के बारे में केवल अर्ध-सत्य जानते हैं। आरएसएस की हिन्दू राष्ट्र की योजना के अनुसार शूद्र (दलित) और हिन्दू महिलाऐं अवमानवीय हैसियत रखते हैं। इसी लिए जब भारत की संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंतिम रूप दिया (नवम्बर 26, 1949) तो आरएसएस ने ‘मनुस्मृति’ को भारत का संविधान घोषित नहीं किये जाने पर ज़ोरदार आपत्ति व्यक्त की। अपने अंग्रेज़ी मुखपत्र में एक संपादकीय में उसने शिकायत कीः
हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गयी थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’ में उल्लिखित है, विश्वभर में सराहना की जाती रही है और यह स्वतःस्फूर्त धार्मिक नियम-पालन तथा समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।
‘मनुस्मृति’ को आज़ाद भारत का संविधान बनाने की आरएसएस द्वारा मांग, दरअस्ल, इस ने अपने गुरु, दार्शनिक और आदर्श, सावरकर से ग्रहण की थी जिन के अनुसार:
मनुस्मृति’ एक ऐसा धर्मग्रंथ है जो हमारे हिन्दू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सर्वाधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति रीति-रिवाज, विचार तथा आचरण का आधार हो गया है। सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक एवं दैविक अभियान को संहिताबद्ध किया है। आज भी करोड़ों हिन्दू अपने जीवन तथा आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे ‘मनुस्मृति’ पर आधारित हैं। आज ‘मनुस्मृति’ हिन्दू विधि है।[57]
25. आरएसएस के लिए हिंदू धर्म, हिंदू राष्ट्र और जातिवाद पर्यायवाची हैं।
आरएसएस का ‘मनुस्मृति’ के प्रति प्रतिबद्धिता इस के जातिवाद में अटूट विश्वास को भी रेखांकित करती है। यह जातिवाद हे है जिस ने छुआछूत जैसे मानवता विरोधी प्रचलन को जनम दिया। आरएसएस के अनुसार जातिवाद हिन्दू धर्म का सार है। गोलवलकर ने बिना किसी हिचकिचाहट के यह घोषणा की कि जातीवाद हिन्दू राष्ट्र का समानार्थी है। उन के अनुसार,
हिन्दू जन…विराट पुरुष हैं, वह सर्वशक्तिमान ख़ुद को उद्घोषित करता हुआ। हालांकि वे हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं करते लेकिन पुरुष-सूक्त [ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल का एक प्रमुख मंत्र] में वर्णित सर्वशक्तिमान के निम्नांकित विवरण से यह स्पष्ट है जहां यह कहा गया है कि सूर्य और चन्द्र उनकी आंखें हैं, तारे और आकाश उनकी नाभि से बनाये गये हैं और ब्राह्मण उनका शीश हैं, क्षत्रिय उनकी बाहें हैं, वैश्य जंघायें तथा शूद्र पैर हैं। इसका अर्थ है कि जो लोग इस चार स्तरों वाली व्यवस्था को मानते हैं, यानि हिंदू जन, हमारे ईश्वर हैं। प्रमुख ईश्वर का यह महानतम दृष्टिकोण हमारी राष्ट्र की अवधारणा के मूल में है और उसने हमारी सोच को परिपक्व किया है तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत की अनेक विशिष्ट अवधारणाओं को जन्म दिया है।[58]
दलितों व हिन्दू महिलाओं से संबंधित जो अमानवीय आदेश ‘मनुस्मृति’ में दिए गए हैं उसके कुछ नमूने यहाँ प्रस्तुत हैं:
25. शूद्रों/दलितों को कलंकित करने वाले मनु के आदेशों के कुछ नमूने।
1. अनादि ब्रह्म ने लोक कल्याण एवं समृद्धि के लिए अपने मुख, बांह, जांघ तथा चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों को उत्पन्न किया। (1/31)
2. भगवान ने शूद्र वर्ण के लोगों के लिए एक ही कर्तव्य-कर्म निर्धारित किया है-तीनों अन्य वर्णों की निर्विकार भाव से सेवा करना। (1/91)
3. शूद्र यदि द्विजातियों-ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को गाली देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए क्योंकि नीच जाति का होने से वह इसी सज़ा का अधिकारी है। (8/270)
4. शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों के नाम एवं जाति उच्चारण करने पर उसके मुंह में दस उंगली लोहे की जलती कील ठोक देनी चाहिए। (8/271)
5. शूद्र द्वारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुंह एवं कान में गरम तेल डाल देना चाहिए। (8/272)
6. यदि वह द्विजाति के किसी व्यक्ति पर जिस अंग से प्रहार करता है, उसका वह अंग काट डाला जाना चाहिए, यही मनु की शिक्षा है।(8/278)
7. यदि लाठी उठाकर आक्रमण करता है तो उसका हाथ काट डालना चाहिए और यदि वह क्रुद्ध होकर पैर से प्रहार करता है तो उसका पैर काट डालना चाहिए। (8/279)
8. उच्च वर्ग के लोगों के साथ बैठने की इच्छा रखने वाले शूद्र की कमर को दाग़ करके उसे वहां से निकाल भगाना चाहिए अथवा उसके नितम्ब को इस तरह से कटवा देना चााहिए जिससे वह न मरे और न जिये। (8/280)
9. अहंकारवश नीच व्यक्ति द्वारा उच्चजाति पर थूकने पर राजा को उसके होंठ, पेशाब करने पर लिंग एवं हवा छोड़ने पर गुदा कटवा देना चाहिए। (8/281)
एक तरफ़ तो शुद्रों के लिए इतने सख़्त और अमानवीय दंड हैं और दूसरी तरफ़ ब्राह्मणों के लिए मनु के प्यार की कोई सीमा नहीं है। अध्याय 8 के श्लोक 380 के अनुसार :
राजा को कभी भी एक ब्रह्मण को मृत्यु दण्ड नहीं देना चाहिए, चाहे वह सभी सम्भव अपराध ही क्यों न कर दे। उसे राज्य से निष्कासित कर देना चाहिए लेकिन उसकी सारी संपत्ति छोड़ देनी चाहिए और उसके शरीर को कोई चोट नहीं पहुंचाना चाहिए ।
26. हिन्दू महिलाओं को कलंकित करने वाले मनु के आदेशों के कुछ नमूने।
1. पुरुषों को अपनी स्त्रियों को सदैव रात-दिन अपने वश में रखना चाहिए। (9/2)
2. स्त्री की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए; एक स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। (9/3)
3. बिगड़ने के छोटे से अवसर से भी स्त्रियों को प्रयत्नपूर्वक और कठोरता से बचाना चाहिए, क्योंकि न बचाने से बिगड़ी स्त्रियां दोनों (पिता और पति के) कुलों को कलंकित करती हैं। (9/5)
4. सभी जातियों के लोगों के लिए स्त्री पर नियंत्रण रखना उत्तम धर्म के रूप में जरूरी है। यह देखकर दुर्बल पतियों को भी अपनी स्त्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए। (9/16)
5. ये स्त्रियां न तो पुरुष के रूप का और न ही उसकी आयु का विचार करती हैं। इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से प्रयोजन है। यही कारण है कि पुरुष को पाते ही ये उससे भोग के लिए प्रस्तुत हो जाती है चाहे वे कुरूप हों या सुुंदर। (9/14)
6. स्वभाव से ही परपुरुषों पर रीझने वाली चंचल चित्त वाली और स्नेह रहित होने से स्त्रियां यत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी पतियों को धोखा दे सकती हैं। (9/15)
7. मनु के अनुसार ब्रह्माजी ने निम्नलिखित प्रवृत्तियां सहज स्वभाव के रूप में स्त्रियों में पाई हैं-उत्तम शैय्या और अलंकारों के उपभोग का मोह, काम-क्रोध, टेढ़ापन, ईष्र्या द्रोह और घूमना-फिरना तथा सज-धजकर दूसरों को दिखाना। (9/17)
मनु के जो आदेश ऊपर पेश किए गए हैं उनको जानकर साफ़ पता चल जाता है कि वे कितने अमानवीय, फ़ासीवादी और पतित हैं। शायद यही कारण था कि जर्मन दार्शनिक, फ्रेडरिक नीत्शे जिन्हों ने यूरोप में 20वीं शताब्दी में अपने लेखन से अधिनायकवादी विचारधाराओं के विकास में अभूतपूर्व सहयोग किया, ‘मनुस्मृति’ की सब से पसंदीदा किताबों में से एक थी।
यहां यह जानना ज़रूरी है कि 25 दिसंबर, 1927 के दिन डा. अम्बेडकर की मौजूदगी में एतिहासिक महाद आंदोलन (महाराष्ट्र) में ‘मनुस्मृति’ को एक अमानवीय ग्रंथ मानकर इसकी प्रति जलायी गई थी।[59]
उसी दिन डॉ. अम्बेडकर ने यह भी आह्वान किया कि हर साल इस दिन को ‘मनुस्मृति’ दहन दिवस’ के रूप में मनाया जाए।[60]
कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है। पूरा देश कम क़ीमत वाले महिला-विरोधी साहित्य से भरा पड़ा है और इसमें से अधिकतर एक ऐसे संगठन द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है और बाज़ार में बेचा जा रहा है जिसका आरएसएस से घनिश्ठ संबंध है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस प्रकाश क को रेलवे स्टेशनों पर सरकार द्वारा स्टाल भी उपलब्ध कराये गये हैं। गीता प्रेस द्वारा घोर महिला विरोधी पुस्तिकाओं में से एक जो सवाल-जवाब के रूप में छापी गयी है, आरएसएस से जुड़ी पुस्तक दुकानों के साथ-साथ खुलेआम उपलब्ध है (स्वामी रामसुखदास, गृहस्थ में कैसे रहें?, गीता प्रेस गोरखपुर) के अंश यहां प्रस्तुत हैः
“प्रश्न: पति मार पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए?
उत्तरः पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है, ऋण है, जो इस रूप में चुकाया जा रहा है; अतः मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूं। पीहर वालों को पता लगने पर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं; क्योंकि उन्होंने मार पीट के लिए अपनी कन्या थोड़ी ही दी थी।
प्रश्न: अगर पीहर वाले भी उसको अपने घर न ले जायें तो वह क्या करे?
उत्तरः फिर तो उसको अपने पुराने कर्मों का फल भोग लेना चाहिए, इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है। उसको पति की मार पीट धैर्य-पूर्वक सह लेनी चाहिए। सहने से पाप कट जायेंगे और आगे संभव है कि पति स्नेह भी करने लग जाये।’
अमानवीय सती के पक्ष में भी निर्लज्ज प्रचार किया गया है जैसा कि हम निम्नलिखित अंश में देखेंगेः
प्रश्न: सती प्रथा उचित है या अनुचित?
उत्तरः सती होना ‘प्रथा’ है ही नहीं। पति के साथ जल जाना सती होना नहीं है। जिसके मन में सत् आ जाता है, उत्साह आ जाता है, वह आग के बिना भी जल जाती है और उसको जलने का कोई कष्ट भी नहीं होता। यह कोई प्रथा नहीं है कि वह ऐसा ही करे। प्रत्युत यह तो उसका सत्य है, धर्म है, श स्त्र-मर्यादा पर विष्वास है।[61]
27. ‘काली चमड़ी’ वाले दक्षिण भारतीयों के प्रति आरएसएस की नफ़रत।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक ख़ास फ़ासी वादी-नाज़ी पहचान ‘काली चमड़ी’या अनार्य लोगों के प्रति नफ़रत है। बहुत अर्सा नहीं बीता, आरएसएस के एक वरिष्ठ विचारक, संगठन के हिंदी मुखपत्र ‘पाञ्चजन्य’के पूर्व संपादक, सांसद तरुण विजय तमिलनाडु को संघ ने दक्षिण भारत में हिंदुत्व की राजनीति के प्रसार की ज़िम्मेदारी दी थी। इसके अलावा वे ‘भारत-अफ़्रीका संसदीय मैत्री समूह’ के भी अध्यक्ष थे। एक वैश्विक समाचार नेटवर्क के साथ बात करते समय उन्होंने भारत में अफ़्रीकी नागरिकों पर नस्लवादी आक्षेप से इंकार किया, परंतु उनके जवाब से ज़ाहिर हो गया कि वे किस हद तक नस्लवादी हैं। अपने जवाब में उन्हों ने कहा :
यदि हम नस्लवादी होते, तो (हम) पूरे दक्षिण (भारत) में क्यों होते, जो पूरी तरह से ... आप जानते है तमिल(लोग) हैं, आप केरल (के लोगों) , आप कर्नाटक और आंध्र के लोगों से भी परिचित हैं। हम उनके साथ क्यों रहते हैं? हमारे चारों ओर काले लोग हैं।68
आरएसएस के बौद्धिक शिविर से प्राप्त ज्ञान की ही यह अभिव्यक्ति थी। तरुण विजय बताने की कोशिश कर रहे थे कि हम गोरे उत्तर भारतीय हैं, “हमारे आसपास काले लोगों” हैं, जिनके साथ हम रह रहे हैं, ये तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र में निवास करते हैं। तरुण के बयान ने भारत के बारे में आरएसएस की नस्लवादी समझ को फिर से परिभाषित किया; उत्तर भारतीय गोरे (आर्य) हैं जबकि दक्षिण भारतीय काले (द्रविड़) हैं। ये दो भिन्न जातियों से संबंधित हैं। उसका संदेश यह था कि उत्तर के आर्य दक्षिण भारतीय कालों को अपने साथ रख कर सामंजस्य का परिचय दे रहे हैं।
28. गोलवलकर: केरल के हिन्दुओं की नस्ल सुधारने के लिए उत्तरी भारत से नम्बूदरी ब्राह्मणों को भेजा गया; केरल के हिन्दुओं विशेषकर महिलाओं को कलंकित करना।
आरएसएस हमारे देश और दुनिया में हिन्दुओं का सबसे बड़ा संगठन होने का दावा करता है। बहरहाल, यह निष्कर्ष निकालना कोई मुश्किल काम नहीं है कि गोलवलकर और आरएसएस के लिये भारत का मतलब केवल उत्तर भारत तक सीमित था। जब वे ‘हिन्दू स्वर्ण काल’ की बात करते हैं तो इसका मतलब होता है उत्तर भारत का स्वर्ण काल।’[62] यह केवल मुसलमानों और इसाईयों को ही बहिष्कृत नहीं करता बल्कि उत्तरभारतीय ब्राह्मणों को छोड़कर अन्य सभी हिन्दुओं को भी बहिष्कृत करता है । इसे 17 सितंबर 1960 को गुजरात विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान अध्ययन केन्द्र के विद्यार्थियों को दिये गये गोलवरकर के भाषण में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। इस भाषण में नस्ल सिद्धांत पर अपने दृढ़ विश्वास को रेखांकित करते हुए वे हिन्दू समाज के इतिहास में मानवजाति की संकर नस्लों के प्रयोग (cross breeding) के मुद्दे को छूते हैं। वह कहते हैं -
आजकल संकर प्रजाति के प्रयोग केवल जानवरों पर किये जाते हैं। लेकिन मानवों पर ऐसे प्रयोग करने की हिम्मत आज के तथाकथित आधुनिक विद्वानों में भी नहीं है। अगर कुछ लोगों में यह देखा भी जा रहा है तो यह किसी वैज्ञानिक प्रयोग का नहीं अपितु दैहिक वासना का परिणाम है। आइये अब हम यह देखते हैं कि हमारे पुरखों ने इस क्षेत्र में क्या प्रयोग किये। मानव नस्लों को क्रास ब्रीडिंग द्वारा बेहतर बनाने के लिये उत्तर के नंबूदरी ब्राह्मणों को केरल में बसाया गया और एक नियम बनाया गया कि नंबूदरी परिवार का सबसे बड़ा लड़का केवल केरल की वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र लड़की से शादी कर सकता है। एक और इससे भी अधिक साहसी नियम यह था कि किसी भी जाति की विवाहित महिला की पहली संतान नंबूदरी ब्राह्मण से होनी चाहिये और उसके बाद ही वह अपने पति से संतानोत्पति कर सकती है। आज इस प्रयोग को व्याभिचार कहा जायेगा, पर ऐसा नहीं है क्योंकि यह तो पहली संतान तक ही सीमित है।[63]
गोलवलकर का यह बयान कई तरीक़े से अत्यंत अपमानजनक है। पहला तो यह कि इससे साबित होता है कि गोलवलकर का विश्वास था कि भारत में हिन्दुओं की एक बेहतर नस्ल या वंशावली है तथा एक कमतर नस्ल भी है जिसे क्रास-ब्रीडिंग द्वारा ख़ुद को सुधारे जाने की ज़रूरत है।
दूसरा, उनके विश्वास का और अधिक चिंतनीय पहलू यह है कि उनके अनुसार केवल उत्तर भारतीय ब्राह्मण ; ख़ासतौर पर नंबूदरी ब्राह्मण ही उस बेहतर नस्ल से संबंध रखते थे। इस नस्लीय श्रेष्ठता के कारण ही नंबूदरी ब्राह्मणों को उत्तर से केरल में वहां के हिन्दूओं की, जिसमें वहां के ब्राह्मण भी शामिल थे, हीन प्रजाति को सुधारने के लिए भेजा गया था। यह रोचक है कि यह तर्क एक ऐसे आदमी के द्वारा दिया जा रहा है जो दुनिया भर के सारे हिन्दूओं की एकता स्थापित करने की बात करता है।
तीसरा, वह एक पुरुष वर्चस्ववादी की तरह यह विश्वास करते थे कि केवल उत्तर भारत की एक श्रेष्ठ नस्ल से संबद्ध नंबूदरी ब्राह्मण पुरुष ही दक्षिण की हीन मानव नस्ल को सुधार सकते थे। उनके लिये केरल की हिंदू महिलाओं की गर्भ की पवित्रता का कोई मतलब नहीं था और वे केवल उन नंबूदरी ब्राह्मणों से सहवास द्वारा प्रजाति सुधारने के लिये उपयोग की जाने वाली वस्तुएं थीं जिनसे उनका कोई संबंध नहीं था। इस प्रकार गोलवलकर, दरअसल, इस आरोप को पुष्ट कर रहे थे कि पुराने समय के पुरुष प्रधान उच्च जाति के समाजों में दूसरी जाति की नवविवाहित महिलाओं को अपनी पहली रातें ‘श्रेष्ठ’ जाति के पुरुषों के साथ बिताने पर मज़बूर किया जाता था। इस प्रकार की घृणित परंपरा के समर्थन में में दिये गये गोलवलकर के तर्क बिल्कुल वही हैं जो बीते समय में नीची कही जाने वाली जातियों के अपमान को सही ठहराने के लिये सामंती तत्व दिया करते थे। यह एक सुपरिचित तथ्य है कि भारत के सामंती शासक अक्सर नीची कही जाने वाली जातियों की नवविवाहिताओं को उनकी पहली रातें अपने महलों में गुज़ारने पर बाध्य किया करते थे।
आश्चर्यजनक रूप से गोलवलकर ने अपना यह नस्ली, अमानवीय, स्त्री विरोधी और समानता विरोधी दृष्टिकोण अनपढ़ों या गुण्डों की किसी भीड़ के आगे नहीं बल्कि गुजरात के एक प्रमुख विश्विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों की एक श्रेष्ठ सभा में प्रस्तुत किया। वस्तुतः, आर्गेनाइज़र में छपी रिपोर्ट के अनुसार सभागृह में पहुंचने पर उनका स्वागत एक अत्यंत प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री डा बी आर शेनाय द्वारा किया गया।[64] प्रेस रिपोर्टों से यह स्पष्ट है कि इन फ़ासिस्ट और उपहासजनक विचारों के ख़िलाफ़ विरोध की कोई फुसफुसाहट भी नहीं हुई। इससे पता चलता है कि गुजरात में उच्च जाति के वक्ताओं का कितना सम्मान था और इस बात की व्याख्या होती है कि कैसे हिन्दुत्व इस क्षेत्र में पांव पसार पाया।
यह बहुत दुखद है कि केरल के समस्त हिन्दू समाज और विशेषकर हिन्दू औरतों के बारे में इतने शर्मनाक और आपत्तिजनक विचार बेशर्मी से रखने के बावजूद आरएसएस केरल राज्य हिन्दुओं के बीच में स्वीकारिता हासिल करने में सफ़ल हुयी है। गुजरात के बाद जिस राज्य में आरएसएस का ख़ासा विकास हुवा है वह केरल ही है।
29. आरएसएस द्वारा आतंकवादी गतिविधियों में षड्यन्त्रों का इस्तेमाल।
किसी भी अन्य आतंकवादी संगठन की तरह आरएसएस भी अपने देश और समाज विरोधी मंसूबों को अमल में लाने के लिए षड्यंत्रों का व्यापक तौर पर इस्तेमाल करता है। आरएसएस के केंद्रीय प्रकाशन संसथान, सुरुचि प्रकाशन ने 1977 में ‘परम वैभव के पथ पर’ हिंदी में एक पुस्तक छपी। इस में आरएसएस ने जिन 40 से ज़्यादा संगठन अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए बनाये हैं उनका विस्तार से वर्णन किया। [65]
इस पुस्तक से साफ़ पता चलता है कि आरएसएस अपने सहायक संगठनों के जरिये एक सुसंगठित माफिया की तरह काम करता है ।इसके विभिन्न मोर्चों के बारे में काफ़ी भ्रम बना कर रखा जाता है ताकि आरएसएस को अपनी सुविधानुसार इनमें से किसी से भी अपने को अलग करने में कोई परेशानी न हो। उदाहरण के लिए, 1990 के दशक के अंत में उसने ईसाइयों पर हमला करने के लिए हिन्दू जागरण मंच का उपयोग किया और जब जनमत, मीडिया तथा संसद ने उसके ख़िलाफ़ आवाज उठायी तो आरएसएस ने हिन्दू जागरण मंच से किसी भी तरह के संबंध होने से इन्कार कर दिया। इसी तरह जब विश्व- हिन्दू परिशद, बजरंग दल तथा धर्म संसद के घोर सम्पर्दायिक इरादों का राष्ट्र के सामने पर्दाफ़ाश हुआ तो आरएसएस ने घोषणा की कि ये स्वतंत्र संगठन हैं।
यहाँ यह जानना महत्पूर्ण है की आरएसएस द्वारा पैदा किए गए कई संगठन गुप्त तरीक़े से काम करते हैं जैसा आम तौर पर आतंकी संगठनों में होता है। आरएसएस के इस प्रकाशन में ‘हिन्दू जागरण मंच’ के बारे में जानकारी देते हुए बेहिजक बताया गया है की,
हिन्दू जागरण की दृष्टी से ऐसे मंच इस समय (1997 में) 17 प्रदेशों में भिन्ननामों से कार्यरत हैं, जैसे दिल्ली में ‘हिन्दू मंच’, तमिलनाडू में ‘हिन्दू मुनानी’, महाराष्ट्र में ‘हिन्दू एकजुट’, यह मंच हैं संस्था या संगठन नहीं, इस लिए इन में सदसयता, पंजीकरण, चुनाव इतियादी आवशयक नहीं हैं।[66]
यह साफ़ है कि यह कानून या सरकार द्वारा किसी तरह की पड़ताल से बचने के लिए माफ़िया के रूप में काम करता है। इस तरह की संगठनात्मक प्रणाली आरएसएस को किसी भी व्यक्ति या संगठन से पल्ला झाड़ने का अवसर प्रदान करती है।
आरएसएस एक गुप्त संगठन के तौर पर किस तरह षड्यंत्रों का बड़े पैमाने पर सहारा लेता है इसकी जानकारी भी इसी किताब से मिलती है, आरएसएस के इस प्रकाशन के अनुसार :
दिल्ली की मुसलिम लीग का विश्वास-सम्पादन करके उनके षड्यंत्रों का पता लगाने के लिए स्वयंसेवकों (आरएसएस के सदस्यों) ने मुसलमान मज़हब [आरएसएस के इस लेखक नेता का तात्पर्य इस्लाम धर्म से है जिसे वह नासमझी के कारण ‘मुसलमान मज़हब’ बता रहे हैं] स्वीकार करने का ढोंग रचा था... [67]
आरएसएस के कार्यकर्ता मुसलमान मज़हब अर्थात मुसलमानों का चेहरा-मोहरा बनाकर किस तरह की साज़िशें रच रहे थे उसका ख़ुलासा कांग्रेस के वरिष्ठ और राष्ट्रीय नेता डॅा॰ राजेन्द्र प्रसाद (जो बाद में मुल्क के पहले राष्ट्रपति भी बने) ने भारत के पहले गृह-मंत्री सरदार पटेल को 14 मार्च 1948 को लिखे पत्र में, इन शब्दों में किया था :
मुझे पता लगा है कि आरएसएस के लोग दंगे (साम्प्रदायिक) कराने की कोशिश कर रहे हैं, इन्होंने एक अच्छी ख़ासी संख्या में पुरुषों को मुसलमानी पोशाक पहनाई है जो मुसलमानों की तरह दिखते हैं। ये हिंदुओं पर हमला करेंगे जिससे झगड़ा होगा और हिंदू भड़क जाएंगे। इसी तरह से इनके बीच के कुछ हिंदू मुसलमानों पर हमले करेंगे और उनको भड़काएंगे। हिंदू मुसलमानों के बीच में झगड़े कराने का उद्देश्य बड़ी आग लगाना है।[68]
स्वतंत्र भारत के प्रथम गृह-मंत्री सारदार पटेल आरएसएस के इस शर्मनाक षड्यंत्रकारी चरित्र से परिचित थे जिसकी जानकारी स्वयं उन्हों ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक पात्र में इन शब्दों में दी:
आरएसएस जैसे गोपनीय संगठन के बारे में जिस का कोई रेकार्ड, रेजिस्टर (पंजिका) इत्यादि नहीं होते हैं, यह प्रामाणिक जानकारी प्रस्तुत करना की कोई व्यक्ति विशेष इस का सक्रिय कार्यकर्ता है या नहीं, एक बहुत मुश्किल काम होता है।[69]
30. श्रेष्ठ हिन्दू नस्ल विश्व पर राज करेगी।
सावरकर, आरएसएस और मौजूदा प्रधान मंत्री मोदी के लिए महानतम पूजनिए हस्ती हैं। उन्हों ने अपनी विवादस्पद पुस्तक ‘हिंदुत्व’ (1923) का अंत इस युद्धघोष के साथ किया कि हिन्दू जो आर्य-नस्ल का हिस्सा हैं उन की नियति है कि वे सारे विश्व पर राज करेंगे। उन के अनुसार हिन्दू एक महान नस्ल जिसके,
बाइस करोड़ लोग (सन् 1923 में “हिन्दुत्व” लिखने के समय भारत की आबादी), भारत भूमि उनके संग्राम के आधार के तौर पर, उनकी पितृभूमि के लिए, उनकी पुण्यभूमि के लिए अपने महान इतिहास के साथ एक ख़ून और एक संस्कृति के सूत्र में बँधे होकर पूरे विश्व को नतमस्तक होने पर विवश कर सकते हैं। एक समय आएगा जब मानव जाति को इस ताक़त का सामना करना पड़ेगा।[70]
गोलवलकर ने भी सावरकर के साम्राज्वादी मंसूबे, की हिन्दू विश्व पर राज करेंगे से पूर्णतय सहमती जताते हुए भविष्य-वाणी की कि सारी दुनिया पर जल्द ही हिन्दुओं का राज होगा[71] वे विश्व के शासक होंगे कियोंकि,
एक महान राष्ट्र की एक महान नस्ल—[जिस] ने एक धर्म का प्रतिपादन किया, जो कोई बनावटी विश्वास नहीं, बल्कि अपने सारतत्त्व में धर्म है, और उदात्त कुलीनता की एक ऐसी संस्कृति का निर्माण किया, जिसे देखकर विदेशी यात्री अवाक रह गये, एक ऐसी संस्कृति जिसने हर व्यक्ति को मानवता, सत्य और उदात्तता का प्रतिरूप बना दिया, जिसके दैवीय प्रभाव में लाखों लोगों में से किसी एक ने भी न तो कभी झूठ बोला, न चोरी की और न ही किसी अनैतिक काम में कभी शामिल हुए; और यह सब पश्चिम के कच्चे की जगह भुना मांस खाना सीखने के पहले ही हो चुका था! और हम एक राष्ट्र थे, प्राचीन वेदों का यही तूर्यनाद था—‘समुद्र से समुद्र तक संपूर्ण भूमि पर—एक राष्ट्र!’[72]
गोलवलकर के अनुसार विश्व के हुक्मरान बनने के लिए हिन्दुओं ने केवल अपनी नस्ली भावना और राष्ट्रीय चेतना को फिर एक बार फिर जागृत करना होगा। गोलवलकर के निम्मनलिखित शब्द किसी भी मायने में हिटलर और मुसोलिनी द्वारा विश्व पर राज करने के शर्मनाक मंसूबे से भिन्न विस्तारवादी योजना का बखान नहीं करते,
नस्ली चेतना जाग्रत हो रही है। शेर मरा नहीं था, बस सो रहा था। वह अब ख़ुद को फिर से जगा रहा है और दुनिया को पुनर्जाग्रत हिन्दू राष्ट्र की शक्ति को अपने बलवती हाथों से दुश्मन के घरौंदे को गिराते हुए देखना होगा। एक तारा उग चुका है और लगातार नभमण्डल की ओर बढ़ रहा है। वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया इसे देखेगी और या तो डर से कांपने लगेगी या फिर खुशी से नाचने लगेगी। यह सब उनकी प्रकृति पर निर्भर करेगा जिन पर यह चमकेगा।[73]
उन्हों ने हिन्दुओं का आह्वान किया कि वे
अपने हिंदू ध्वज, भगवा ध्वज के तले एकजुट हों और दांतभींच कर अपनी विरोधी ताक़तों का सफ़ाया करने का कठोर संकल्प लें।[74]
गोलवलकर के अनुसार हिन्दू नस्ल को ईश्वर ने दुनिया पर राज करने का काम सौंपा है। उनके समक्ष उदास होने या डरने की और निराश होने की क़तई ज़रूरत नहीं है। गोलवलकर ने लिखा –
अपने सिंहासन पर पुनः आरूढ़ होने के लिए हमें जाग्रत नस्ली भावना के अनूकूल व्यवहार करना है और अपनी राष्ट्रीय चेतना को फिर से जगाना है और जीत हमारी मुठ्ठी में है। हमारे सन्यासियों की अमर वाणी हमें पुकार रही है, आओ कमर कस लें और उनका अनुसरण करें। नस्ल की भावना हमारा प्रकाश स्तम्भ है और उसने अपने बच्चों के लिए उनके प्रिय पथ का मार्ग अन्तर्निहित आध्यात्मिक भव्यता से आलोकित कर दिया है। आओ अपनी सच्ची राष्ट्रीयता को जाग्रत करें, आओ अपनी नस्ली भावना द्वारा दिखाये रास्ते पर चलें और आकाश को वैदिक ॠषियों के इस आह्वान मंत्र से गुंजायमान कर दें – ‘समुद्र से समुद्र तक संपूर्ण भूमि पर—एक राष्ट्र’, संपूर्ण विश्व पर उदारतापूर्वक शांति और समृद्धि बरसाता एक गौरवशाली भव्य हिंदू राष्ट्र।[75]
दरअसल, गोलवलकर का विश्वास था कि प्राचीन काल में हिन्दूओं ने दुनिया के अधिकतर हिस्से पर राज किया था और अगर ‘नस्ली भावना’ को फिर से जगा दिया जाए तो वे एक बार फिर दुनिया के शासक हो सकते हैं। उन्होंने घोषणा की कि आरएसएस की स्थापना एक वास्तविक व्यावहारिक वैश्विक लक्ष्य के लिए की गयी है और वह है स्वर्णिम अतीत के गौरव को पुनः हासिल करना, जिसमें,
कोलम्बस के अमेरिका की ‘खोज’ के बहुत पहले हमारा विस्तार एक ओर तो अमेरिका तक फैल चुका था और दूसरी ओर चीन, जापान, कम्बोडिया, मलय, थाईलैंड, इण्डोनेशिया तथा सारे दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों तथा में मंगोलिया और साइबेरिया तक फैला हुआ था। हमारा सशक्त राजनैतिक साम्राज्य भी इन दक्षिण-पूर्वी सभी क्षेत्रों में 1400 वर्षों तक फैला रहा। एक शैलेन्द्र साम्राज्य ही 700 वर्षों से अधिक काल तक...अत्यंत उत्कर्ष (की) अवस्था में रहा।[76]
आरएसएस ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकारा है कि वो 39 देशों में सक्रिए है। इस तरह आरएसएस विश्व पर हिन्दुत्वादी प्रभुत्व स्थापित करने के लिए 39 देशों में घुसपैठ कर चूका है।[77] इस के अतिरिक्त बहुत मुमकिन है कि आरएसएस अन्य कई देशों में वहां के फ़ासीवादी संगठों के साथ ताल-मेल बिठाकर सक्रिय हो।
आरएसएस के अपने दस्तावेज़ों में दर्ज इन सच्चइयों को जानकार इस नतीजे पर पहुंचना कि आरएसएस एक आतंकी संगठन है, ज़रा भी मुश्किल नहीं है। इस तरह आरएसएस केवल भारत के प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए ही नहीं बल्कि विश्व भर में शांति और सह-अस्तित्व के लिए हिटलर और मुसोलिनी के बाद सब से भयानक ख़तरा बनकर उभरा है। विश्व भर के तमाम प्रजातान्त्रिक समाज, संगठन और लोग जो हिंदुत्व फ़ासीवाद के खूनी पंजे से दुनिया को बचाना चाहते हैं उन सब ने मिलकर इस का मुक़ाबला करना होगा।
शम्सुल इस्लाम द्वारा लिखी अन्य किताबें
https://pharosmedia.com/books/book-author/dr-shamsul-islam/
- Know the RSS: Based on Rashtriya Swayamsevak Sangh Documents (13th Edition)
- Golwalkar’s “We or Our Nationhood Defined”: A Critique with Full Text of the Book (5th Edition)
- Hindu Nationalism and Rashtriya Swayamsevak Sangh (2nd Edition)
- Muslims Against Partition of India: The Untold Story of Allah Bakhsh and Other Patriotic Muslims (3rd Edition)
- RSS: Marketing Fascism as Hindu Nationalism (1st Edition)
- Indian Freedom Movement and RSS: A story of Betrayal (7th Edition)
- Hindutva: Savarkar Unmasked (5th Edition)
- RSS ko Pahchanen (Urdu اُردُو ) — Rashtriya Swayamsevak Sangh apnee dastawezaat kee roshni mein (1st Edition)
- आरएसएस को पहचानें (Hindi) RSS Ko Pehchaney (13th Edition)
- गोलवलकर की “हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा” - वी ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइंड Golwalkar ki ‘Ham ya hamaari raashtreeyata ki paribhaasha’ —ek aalochanaatmak vivechana (Hindi) (1st Edition)
- भारत-विभाजन विरोधी मुसलमान (Hindi) Bharat-Vibhajan Virodhi Musalmaan (1st Edition)
- Taqseem-e-Hind Ke Mukhalif Musalmaan (Urdu) تقسیمِ ہند کے مخالف مسلمان
- 1857 की अनकही हैरत अंगेज़ दास्तानें (Hindi) 1857 ankahi hairat angez dastanein (4th Edition)
- Bharatiya
Swatantrata Andolan Aur RSS (Hindi) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस: Ek daastaan ghaddaari ki (1st Edition)
- सावरकर--हिन्दुत्व मिथक और सच Savarkar-Hindutva: Mithak aur Sach (Hindi) (4th Edition)
[1] हिंदुत्व उस विचार का नाम है जो भारत को केवल हिन्दुओं का राष्ट्र मानता है जिसमें मुस्लमान और ईसाईयों के लिए कोई जगह नहीं होगी। इस के साथ हे यह देश के मौजूदा प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष संविधान को हटा कर ‘मनुस्मृति’ को लागू करने की मांग करता है। विस्तारित जानकारी के लिए देखें: https://www.academia.edu/42081045/.
[2] Modi’s interview to two Reuters journalists, Ross Colvin and Sruthi Gottipati, on July 12, 2013. Link: http://blogs.reuters.com/india/2013/07/12/interview-with-bjp-leader-narendra-modi/
[3] Piyush Srivastava, “We will free India of Muslims and Christians by 2021’, Mail Today, 19 December 2014.
[4] Seshadri, H. V. (ed.), Dr. Hedgewar, the Epoch-Maker: A Biography, Sahitya Sindhu, Bangalore, 1981, p. 61.
[5] Savarkar, V. D., Hindutva (Delhi: Bharti Sahitya Sadan, 1989; sixth edition), p. 100-101.
[6] All quotes from Casolari, Marzia ‘Hindutva’s Foreign Tie-up in the 1930’s-Archival Evidence, The Economic & Political Weekly, January 22, 2000, p. 221.
[7] https://www.telegraphindia.com/opinion/how-india-in-the-2020s-resembles-italy-in-the-1920s/cid/1791736
[8] Golwalkar, MS, We Or Our Nationhood Defined, Nagpur, 1939, p. 45.
[9] Golwalkar, MS, We Or Our Nationhood Defined, Nagpur, 1939, pp. 34-35.
[10] Golwalkar, MS, We Or Our Nationhood Defined, Nagpur, 1939, pp. pp.47-48.
[11] MSA, Home Special Department, 60 D(g) Pt III, 1938, ‘Translation of the verbatim speech made by V D Savarkar at Malegaon on October 14, 1938, cited in cited in Marzia Casolari, p. 223.
[12] http://www.coastaldigest.com/rss-chief-mohan-bhagwat-advocates-israel-model-nationalism?page=24
[13] https://www.jpost.com/opinion/rashtriya-swayamsevak-sangh-rss-and-its-views-on-israel-598435
[14] ‘Faith of the bigot’ in The Telegraph, Calcutta, February 24, 2007.
[15] https://www.indiatvnews.com/video/news/rss-chief-mohan-bhagwat-performed-arms-worship-659637 और
https://www.punjabkesari.in/national/news/rss-chief-mohan-bhagwat-worshiped-arms-on-dussehra-1267958
[16] https://www.narendramodi.in/mobile/narendra-modi-performs-shastra-puja-on-vijayadashmi
[17] https://www.indiatoday.in/india/story/book-rss-chief-under-organised-crime-act-for-possessing-weapons-prakash-ambedkar-demands-1366590-2018-10-12
[18] Dayal, Rajeshwar, A Life of Our Times, Orient Longman, Delhi, 1999, pp. 93-94.
[19] प्रसिद्द लेखक और संपादक खुशवंत सिंह के साप्ताहिक कॉलम में उद्धृत, हिंदुस्तान टाइम्स दिल्ली, 12 मई 2001। इस आत्मकथा की प्रशंसात्मक भूमिका आरएसएस के तात्कालीन प्रमुख केएस सुदर्शन ने लिखी है। संयोग से रस्तोगी को राजग के शासनकाल में 50 सांसदों द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की दो समितियों में नामांकित किया गया। उस समय (2002 में) मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे।
[20] Justice on Trial, RSS, Bangalore, 1962, pp. 26-28.
[21] http://indianexpress.com/article/opinion/columns/i-feel-i-am-on-a-hit-list/
[22] Hindustan Times, New Delhi, March 21, 2002.
[23] Golwalkar, M.S., Bunch of Thoughts, Sahitya Sindhu, Bangalore, 1996, p. 177.
[24] Bunch of Thoughts, pp. 177-178.
[25] Bunch of Thoughts, p. 185.
[26] Bunch of Thoughts, p. 187.
[27] Bunch of Thoughts, p. 193.
[28] https://scroll.in/article/762784/haryana-cm-khattar-is-now-telling-muslims-what-they-must-do-if-they-want-to-stay-in-india
[29] MS Golwalkar, Spotlight, Sahitya Sindhu (RSS publication house), Bangalore, 1974, p. 98.
[30] Vivekananda, Swami, The Complete Works of Swami Vivekananda, vol. 3 (Calcutta: Advaita Ashram, 1997), p. 536.
[31] Vivekananda, Swami, The Complete Works of Swami Vivekananda, vol. 3, Advaita Ashram, Calcutta, 1997, p. 174.
[32] C. Kunhan Raja, “Vedic Culture”, cited in the series, Suniti Kumar Chatterji and others (eds.), The Cultural Heritage of India, vol. 1 (Calcutta: The Ramakrishna Mission, 1993), p. 217.
[33] Ibid.
[34] https://www.cnbctv18.com/politics/rss-chief-mohan-bhagwats-dussehra-speech-dont-use-lynching-to-defame-india-4493351.htm
[35] https://indianexpress.com/article/explained/rss-chief-mohan-bhagwat-speech-india-dussehra-nagpur-6059342/
[36] https://timesofindia.indiatimes.com/india/rashtrapati-bhavan-like-taj-mahal-is-a-sign-of-slavery-it-too-should-be-destroyed-sps-azam-khan/articleshow/61113030.cms
[37] https://timesofindia.indiatimes.com/india/rashtrapati-bhavan-like-taj-mahal-is-a-sign-of-slavery-it-too-should-be-destroyed-sps-azam-khan/articleshow/61113030.cms
[38] http://indianexpress.com/article/india/sangeet-som-taj-mahal-blot-comment-bjp-uttar-pradesh-yogi-adityanath-4895772/
[39] http://www.tribuneindia.com/news/nation/taj-mahal-is-a-hindu-temple-says-bjp-rajya-sabha-mp-vinay-katiyar/484026.html
[40] http://indianexpress.com/article/india/sangeet-som-taj-mahal-blot-comment-bjp-uttar-pradesh-yogi-adityanath-4895772/
[41] https://indianexpress.com/article/cities/lucknow/how-can-mughals-be-our-heroes-says-up-cm-as-he-renames-mughal-museum-near-taj-after-shivaji-6596317/, https://www.indiatoday.in/india/story/yogi-adityanath-taj-mahal-agra-mughals-1021709-2017-06-30
[42] Golwalkar, MS, The Spotlights, Sahitya Sindhu, Bangalore, 1974, p. 171.
[43] Savarkar, VD, Samagra Savarkar Wangmaya: Hindu Rashtra Darshan, vol. vi, Maharashtra Prantik Hindusabha, Poona, 1963, p. 349.
[44] मूल दसतावेज़ के लिए देखें:
https://www.academia.edu/40802762/
[45] Full English text of the RSS ideologue Nana Deshmukh’s document, link: https://www.academia.edu/4890979/
[46] http://www.nytimes.com/2014/10/16/opinion/deadly-alliances-against-muslims.html
[47] http://www.thehindu.com/news/national/norwegian-mass-killers-manifesto-hails- hindutva/article2293829.ece
[48] ://www.thehindu.com/news/national/norwegian-mass-killers-manifesto-hails- hindutva/article2293829.ece
[49] Letter 64 in Sardar Patel: Select Correspondence1945-1950, volume 2, Navjivan Publishing House, Ahmedabad, 1977, pp. 276-77.
[50] https://www.thehindu.com/news/national/uproar-in-rs-over-eulogising-godse/article6682464.ece
[51] https://indianexpress.com/article/india/after-pragya-now-mp-bjp-mla-usha-thakur-terms-nathuram-godse-nationalist-5755162/
[52] https://www.freepressjournal.in/india/how-gandhis-killer-nathuram-godse-is-more-alive-than-the-mahatma-himself-today-in-india https://www.freepressjournal.in/india/how-gandhis-killer-nathuram-godse-is-more-alive-than-the-mahatma-himself-today-in-india
[53] For the original letter see: https://www.academia.edu/36746035/
[54] https://www.academia.edu/4059744/.
[55] http://www.hindujagruti.org/news/16527_mohandas-gandhi-was-terrible-wicked-and-most-sinful.html.
[56] https://forumforhinduawakening.org/dharma/news/2013/06/11/ mohandas-gandhi-terrible-wicked-sinful-shri-k-v-sitaramaiah/.
[57] Savarkar, V.D., ‘Women in Manusmriti’ in Savarkar Samagar (collection of Savarkar’s writings in Hindi) volume IV, Prabhat, Delhi, 2000, p. 416.
[58] Golwalkar, M. S., Bunch of Thoughts, p.36-37.
[59] https://www.thehindu.com/news/national/andhra-pradesh/manusmriti-dahan-divas-protest-staged-at-collectorate/article30396588.ece
[60] The above selection of Manu’s Codes is from F. Max Muller, Laws of Manu, LP Publications, Delhi, 1996; first published in 1886. The bracket after each code incorporates number of chapter/number of code according to the above edition.
[61] Ibid, p. 36.
[62] देखें, ज्याफ़्री हास्किंग और जार्ज़ स्काफ़ लिन द्वारा संपादित किताब ‘मिथ्स आफ़ नेशनहुड’ में एंथनी स्मिथ का लेख ‘द गोल्डेन एज़ एण्ड द नेशनल रिवाइवल’ पेज़ 7 पर, प्रकाशक – हर्स्ट एण्ड कंपनी, लंदन, 2000
[63] M. S. Golwalkar cited in Organiser, January 2, 1961.
[64] देखें, आर्गेनाइज़र, जनवरी 2, 1961 का पेज़-5
[65] Sapre, Sadanand D., Parm Vaibhav Ke Path Per, Suruchi, Delhi, 1997, p. 7.
[66] Sapre, Sadanand D., Parm Vaibhav Ke Path Per, Suruchi, Delhi, 1997, p. 64.
[67] Sapre, Sadanand D., Parm Vaibhav Ke Path Per, Suruchi, Delhi, 1997, p. 86.
[68] Rajendra Prasad to Sardar Patel (March 14, 1948) cited in Neerja Singh (ed.), Nehru-Patel: Agreement Within Difference—Select Documents & Correspondences 1933-1950, NBT, Delhi, p. 43.
[69] Shankar, V. (ed.), Sardar Patel: Select Correspondence 1945-50, Navjivan Publishing House, Ahmedabad, 1977, p. 285.
[70] Savarkar , V. D., Hindutva, Bharti Sahitya Sadan, Delhi: 1989 (sixth edition), p. 141..
[71] हिन्दू शक्ति का राज होगा।.
[72] M.S. Golwalkar, We or Our Nationhood Defined, Nagpur: Bharat Publications, 1939, p.9.
[73] M.S. Golwalkar, We or Our Nationhood Defined, Nagpur: Bharat Publications, 1939, p.12.
[74] Ibid. p. 13.
[75] M.S. Golwalkar, We or Our Nationhood Defined, Nagpur: Bharat Publications, 1939, p.12.
[76] गोलवलकर, ‘विचार नवनीत’, पृ. 9-10, साहित्य सिंधु, बैंगलेर, 1996.
[77] https://dailynht.com/story/15541; https://timesofindia.indiatimes.com/india/Rashtriya-Swayamsevak-Sangh-shakha-spreads-its-wings-to-39-countries/articleshow/50260517.cms.